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शिक्षा का बाजार: 'आउटलुक' के बहाने

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'आउटलुक' ने देश के नामचीन शिक्षकों को अपनी पत्रिका का चेहरा बनाया है। देखकर अच्छा लगा। यह बहुत अच्छी बात है। अच्छा शिक्षक होना और भी अच्छी बात है। ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि किसी पत्रिका ने शिक्षकों को अपनी पत्रिका का चेहरा बनाया हो। पत्रिका ने जिन शिक्षकों को अपना चेहरा बनाया है, वे सभी शिक्षक कोचिंग चलाते हैं। बड़े यूटूबर हैं। कोचिंग और यूट्यूब से खूब पैसा कमाते हैं। केवल पटना वाले खान सर के बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने अपने यूटूब चैनल को मोनेटाइज नहीं किया है। ताकि अभ्यर्थी बिना किसी विज्ञापन बाधा के वीडियो देख सके। ऐसा है तो यह अपने आप में एक क्रांतिकारी बात है। सुनने में यह भी आया है कि उनके कोचिंग की फीस भी बहुत कम है। गणित की फीस है मात्र ₹200, इतिहास की ₹200, रेलव परीक्षा की ₹499, भारतीय राज्यव्यवस्था की ₹199, नक्शा की ₹200 और भूगोल की फीस ₹200 है। इससे पता चलता है कि शिक्षा को लेकर खान सर कितने सचेत और संवेदनशील हैं। 'सर्व शिक्षा अभियान' का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है? उनका फीस स्ट्रक्चर इस लिंक पर देखा जा सकता है-  https://topc...

सेलेक्टिव राष्ट्रवादी फिल्म है लालसिंह चड्डा

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  सेलेक्टिव राष्ट्रवादी फिल्म है लालसिंह चड्डा ‘ लाल सिंह चड्डा ’ स्पीनी कार की तरह है , जिसे आप न तो नई कार कह सकते हैं और न ही पुरानी कार। यानी इस फिल्म को न तो ‘ फॉरेस्ट गम्प ’ की नकल कहा जा सकता है और न ही इसका प्लॉट ‘ फॉरेस्ट गम्प ’ से ज्यादा अलग है। यह बिलकुल वैसा ही है कि बाप-दादा ने बड़ी मेहनत से घर की नींव डाली , उस पर भव्य इमारत खड़ा किया और बाद में बेटा उसकी सिर्फ पुताई कराने के बाद पिता से कहता है कि ‘ यह घर मेरा है। ’ बहुत-से लोग इसे ‘ फॉरेस्ट गम्प ’ की नकल मानने से इनकार कर रहे हैं। लेकिन ‘ लाल सिंह चड्डा ’ ने ‘ फॉरेस्ट गम्प ’ की पुताई ही की है। इसे स्वीकार कर लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हाँ , इस फिल्म के मेकर्स  ने इसमें अपना नया रंग जरूर भरा है जो ‘ फॉरेस्ट गम्प ’ से इसे अलग करता है। ‘ लाल सिंह चड्डा ’ में किया गया बदलाव भारतीय दर्शकों की रुचि का परिणाम है। इसमें फिल्म वालों का उतना दोष नहीं है जितना कि हमारा है। करोड़ों रुपये लगाने वाले इस बात का जरूर ध्यान रखते हैं कि दर्शकों से उसकी भरपाई कैसे कराई जाए। अभी हाल ही में हॉलीवुड फिल्म ‘Little ...

'प्रवेश परीक्षा ही न्यायोचित है'

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  'प्रवेश परीक्षा ही न्यायोचित है'   दिल्ली विश्वविद्यालय नॉर्थ कैंपस के अध्यापक ने विवादास्पद बयान दिया कि  ‘ केरल बोर्ड जानबूझकर दिल्ली विश्वविद्यालय में वामपंथी विचारधारा थोपने के लिए अपने छात्रों को सौ प्रतिशत अंक देता है। ’  मुझे बाबा नागार्जुन की एक कविता  ‘ सच न बोलना ’  की कुछ पंक्तियाँ स्मरण हो आईं ,   जिसमें वे कहते हैं-  ‘ रोजी रोटी हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा ,  कोई भी हो ,  निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा ’ । बातें तो पुरानी हैं ,  पर नई लगती हैं। क्या अपने अधिकारों की बात करना कम्युनिस्ट होना है ?  व्यवस्था से सवाल करना ,  रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करना कम्युनिस्ट होना है ?  सवाल नहीं होगा तो संवाद कैसे होगा ?  संवाद नहीं होगा तो लोकतंत्र कैसे बचेगा ?  भारत एक लोकतांत्रिक देश है। प्रत्येक मनुष्य तथा सभी धर्मानुयायियों को अपनी बात कहने-सुनने का हक भारत का संविधान उसे देता है। क्या वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था आम नागरिकों को यह छूट देने के पक्ष में नहीं है ?  ...

‘रामलला नहछू’: सामाजिक सौहार्द का सांस्कृतिक समारोह

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  ‘ रामलला नहछू ’ सोहर छंद है , जिसमें 12 , 10 के विश्राम से 22 मात्राएँ होती हैं। ‘ रामलला नहछू ’ की रचना-तिथि का पता वेणीमाधवदास कृत ‘ गोसांई चरित ’ से मिलता है। उसके दोहा संख्या- 94 में लिखा है कि गोस्वामी जी ने इसकी रचना मिथिला प्रदेश में की है। जैसे- मिथिला में रचना किए , नहछू मंगल दोय। मुनि प्राँचे मंत्रित , किए सुख पावें सब कोय॥ इस दोहे के अनुसार तुलसीदास ने ‘ रामलला नहछू ’ की रचना मिथिला यात्रा के दौरान की थी। सीता का संबंध मिथिलांचल से है और राम का पुर्वांचल के नजदीक अयोध्या से। यहाँ केवल दो आत्माओं का ही नहीं , दो संस्कृतियों का भी परस्पर मेल है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी इसका संबंध मिथिला की संस्कृति से जोड़ा है। वे कहते हैं - “इसमें कथा की सत्यता पर न जाकर प्रथा की सत्यता पर जाना चाहिए , राम का नहछू तो एक बहाना है।” 1 गोस्वामी जी ने मिथिला की संस्कृति का वर्णन कर जनकपुर के राजा जनक और जनक जननी सीता के मान की रक्षा की है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने यह आरोप लगाया है कि यदि यह राम के विवाह का नहछू है , तो उसे मिथिला में होना चाहिए , क्योंकि राम विवाह के पूर्व अय...