‘रामलला नहछू’: सामाजिक सौहार्द का सांस्कृतिक समारोह
‘रामलला नहछू’ सोहर छंद
है, जिसमें 12, 10 के विश्राम से 22
मात्राएँ होती हैं। ‘रामलला नहछू’ की
रचना-तिथि का पता वेणीमाधवदास कृत ‘गोसांई चरित’ से मिलता है। उसके दोहा संख्या- 94 में लिखा है कि गोस्वामी जी ने इसकी
रचना मिथिला प्रदेश में की है। जैसे-
मिथिला
में रचना किए, नहछू मंगल दोय।
मुनि
प्राँचे मंत्रित, किए सुख पावें सब कोय॥
इस
दोहे के अनुसार तुलसीदास ने ‘रामलला नहछू’ की रचना मिथिला यात्रा के दौरान की थी। सीता का संबंध मिथिलांचल से है और
राम का पुर्वांचल के नजदीक अयोध्या से। यहाँ केवल दो आत्माओं का ही नहीं, दो संस्कृतियों का भी परस्पर मेल है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी इसका
संबंध मिथिला की संस्कृति से जोड़ा है। वे कहते हैं - “इसमें कथा की सत्यता पर न
जाकर प्रथा की सत्यता पर जाना चाहिए, राम का नहछू तो एक
बहाना है।”1 गोस्वामी जी ने मिथिला की संस्कृति का वर्णन कर जनकपुर के
राजा जनक और जनक जननी सीता के मान की रक्षा की है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने यह आरोप
लगाया है कि यदि यह राम के विवाह का नहछू है, तो उसे मिथिला
में होना चाहिए, क्योंकि राम विवाह के पूर्व अयोध्या आए ही
नहीं, किन्तु ‘नहछू’ में स्पष्ट लिखा है कि यह नहछू अवधपुर में हुआ-
आज
अवधपुर आनंद नहछू राम क हो।
चलहु
नयन भरि देखिय सोभा धाम क हो।।2
राम
और लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के साथ घूमते हुए मिथिलांचल पहुँचे थे। वहाँ सीता का
स्वयंवर होने वाला था। स्वयंवर में धनुष तोड़कर राम ने सीता से विवाह किया था। विवाह
संबंधी कोई भी संस्कार उस समय राम का नहीं हुआ। लेकिन ‘नहछू’ मिथिलांचल के विवाह पूर्व की एक विशिष्ट
संस्कृति है, जिसके बिना विवाह पूर्ण नहीं माना जाता। इसलिए
गोस्वामी तुलसीदास ने इस विधि वर्णन अलग से ‘रामलला नहछू’ में किया है। डॉ. रामकुमार वर्मा कहते भी हैं कि “वस्तुतः
यह राम-कथा से संबंध रखने वाला नहछू न होकर साधारण नहछू की रीति पर लिखी हुई रचना
है।”3
यह छंद आनंदोत्सव या विवाह के अवसरों पर
स्त्रियों द्वारा गाया जाता है। परिजन परिहास करते हैं और नहछू विधि के गीत गाते
हैं। इस दौरान गाए जाने वाले गीतों में परिजन दूल्हे और उनके माता-पिता को परिहास
के रूप में गाली देते हैं। ऐसे अवसर पर दी जाने वाली गाली से परिजन नाराज नहीं
होते। नहछू संस्कार में नाई या नाइन द्वारा दूल्हे का नाखून काटा जाता है।
मिथिलांचल के नहछू संस्कार में वर और वधू
दोनों की सबसे छोटी अंगुली को नाई या नाइन द्वारा नहरनी से हल्का काटा जाता है और
उससे निकलने वाले खून की एकाध बूंदों को रुई में लगाकर उसे मिठाई में रखकर वर और
वधू को खिलाया जाता है। वर का वधू को और वधू का वर को। लोकमत यह है कि इससे वर और
वधू का खून आपस में घुल-मिल जाता है। उनमें लड़ाइयाँ नहीं होती। दोनों का प्रेम
प्रगाढ़ होता है। इस क्रिया के बाद ही नहछू संस्कार पूर्ण माना जाता है। लेकिन
गोस्वामी तुलसीदास के नहछू संस्कार में नाखून काटने की विधि बताई गई ही। जब नाई या
नाइन दूल्हे का नाखून काटते हैं, तब परिजन के साथ-साथ
आस-पास की महिलाएँ नाई या नाइन से परिहास करते हैं। यह ऐसा संस्कार है जिसमें वर्ग-भेद
और वर्ण-भेद की सीमा समाप्त हो जाती है। सभी वर्ग की स्त्रियाँ इस संस्कार में न
केवल भाग लेती हैं बल्कि एक-दूसरे से परिहास भी करती हैं। इससे पता चलता है कि राम
राजकुमार होकर भी एक साधारण ग्रामीण बालक हैं, राजा का पुत्र
होकर भी प्रजा की संतान हैं। वे सबके हैं, सब उनके अपने हैं।
तुलसीदास की इस छोटी-सी कृति में लोक और संस्कृति एक-दूसरे में घुल-मिल गई है। लोक
और संस्कृत का इतना सूक्ष्म अन्वेषक हिन्दी साहित्य में तुलसी पूर्व कोई नहीं हुआ।
वे लोक संस्कृति के गाहक और वाहक दोनों हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं-
“अपने दृष्टि विस्तार के कारण ही तुलसीदास जी उत्तरी भारत की समग्र जनता के
हृदयमंदिर में पूर्ण प्रेमप्रतिष्ठा के साथ रहे हैं। भारतीय जनता का प्रतिनिधि कवि
किसी को कह सकते हैं तो इन्हीं महानुभाव को।... इनकी वाणी की पहुँच मनुष्य के सारे
भावों और व्यवहारों तक है।”4
‘नहछू’ संस्कार के दौरान माता अपने दूल्हे पुत्र को गोद में लेकर बैठती हैं और
उसके सिर पर अपने आँचल की छाया करती हैं। पुत्रोत्सव के बाद विवाहोत्सव मातृत्व
स्नेह का दूसरा सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण क्षण होता है। गोस्वामी तुलसीदास उस स्नेह
को महसूस कर रहे हैं। माता के हृदय तल की गहराइयों की थाह ले रहे हैं। वे लिखते
हैं कि कौशल्या जी दूल्हा बने राम को अपनी गोद में लेकर बैठी हैं और उनके शीश पर
अपने आँचल की छाया कर रही हैं-
गोद
लिए कौसल्या बैठी रामहि वर हो।
सोभित
दुलह राम सिस पर आँचर हो॥5
सूरदास
के यहाँ पुत्रोत्सव (वात्सल्य) का सौन्दर्य है तो गोस्वामी तुलसीदास के यहाँ
विवाहोत्सव का सौन्दर्य। ऐसे अवसर पर राजा और प्रजा का भेद समाप्त हो जाता है।
सामंत और मजदूर का भेद समाप्त हो जाता है। अमीर और गरीब का भेद समाप्त हो जाता है।
साधारण से साधारण परिवार की स्त्रियाँ राजा, सामंत और
मालिकों से परिहास करती हैं। राजा-महाराजा भी अपने आसन से नीचे उतरकर एक साधारण
मनुष्य की भाँति उस परिहास का आनंद लेते हैं और स्वयं भी परिहास करते हैं। गोस्वामी
तुलसीदास ने राजा दशरथ की इसी रसिकता का वर्णन करते हुए उनको नीच कुल की स्त्रियों
के रूप यौवन पर मुग्ध होते दिखाया है। जैसे-
बनि
बनि आवति नारि जानि गृह मायन हो।
बिहँसत
आउ लोहारिन हाथ बरायन हो॥
अहिरिनि
हाथ दहेंड़ि सगुन लेइ आवइ हो।
उनरत
जोबनु देखि नृपति मन भावइ हो॥6
राजा दशरथ
का यही आचरण उन्हें मनुष्य के रूप में स्थापित करता है। उन्हें जनता का राजा सिद्ध
करता है। उन्हें लोकधर्मी शासक के रूप में प्रतिष्ठित करता है। जो मिथिला की
संस्कृति से अनजान हैं, उन्हें राजा दशरथ का यह आचरण
अश्लील लग सकता है। वे उनकी दृष्टि को दोषी ठहरा सकते हैं। बहुत संभव है कि कोई
उन्हें कुंठित तक कह दें। लेकिन जो मिथिला की संस्कृति से वाकिफ़ हैं, उन्हें पता है कि ‘नहछू’
संस्कार बगैर गाली के पूर्ण नहीं होता। तुलसीदास बड़े कवि हैं। इसलिए उन्होंने वहाँ
की संस्कृति का सजीव वर्णन बिल्कुल मिथिला के अंदाज में किया है। ‘रामलला नहछू’ में यदि गाली का प्रयोग न हुआ होता तो
कवि की प्रतिबद्धता पर संदेह किया जाता। यही वह अवसर है जहाँ दूल्हे की माता को
सामूहिक रूप से गालियाँ दी जाती हैं। गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं-
काहे
रामजिउ साँवर, लछिमन गोर हो।
कीदहुँ
रानि कौसिलहि परिगा भोर हो॥
राम
अहहिं दसरथ कै लछिमन आन क हो।
भरत
सत्रुहन भाइ तौ श्रीरघुनाथ क हो॥7
डॉ. रामकुमार वर्मा का कहना है कि ‘नहछू’ को
लोगों के गाने के लिए बना दिया गया है। वे कहते हैं- “‘नहछू’ में
कवि का न तो अभ्यास है और न ही प्रयास ही। ऐसी स्थिति में या तो ‘नहछू’ कवि
के काव्य-जीवन के प्रभात की रचना होनी चाहिए (‘मानस’ से
बहुत पहले) या ऐसी रचना जिसे कवि ने चलते-फिरते बना दिया हो, जिसे
लोग अश्लील गीतों के स्थान पर गा सकें। जन-साधारण का ध्यान आकर्षित करने के लिए यह
रचना सरल और सुबोध रखी गई, इसमें काव्य-प्रतिभा प्रदर्शित करने की आवश्यकता भी
नहीं समझी गई। जन-साधारण की रुचि के लिए ही शायद कवि ने आवश्यकता से अधिक शृंगार
की मात्रा ‘नहछू’ में रख दी है।”8 बाबू श्यामसुंदरदास तथा डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल
लिखते हैं- “भारत के पूर्वीय प्रांत में अवध से लेकर बिहार तक बारात के पहले चौक
बैठने के समय नाइन से नहछू करने की रीति प्रचलित है। इस पुस्तिका में वही लीला गाई
गई है। इधर का सोहर एक विशेष छंद है, जिसे स्त्रियाँ पुत्रोत्सव आदि अवसरों पर गाती हैं।
पंडित रामगुलाम का मत है कि नहछू चारों भाइयों के यज्ञोपवीत के समय का है। संयुक्त
प्रदेश (उत्तर प्रदेश), मिथिला आदि प्रांतों में यज्ञोपवीत के समय भी नहछू होता
है। रामचन्द्र जी का विवाह आकस्मात् जनकपुर में स्थिर हो गया,
इसलिए विवाह में नहछू नहीं हुआ। गोसांई जी ने इसे वास्तव में विवाह के समय के गंदे
नहछुओं के स्थान पर गाने के लिए बनाया है।”9
नहछू
संस्कार में कई वर्ण की स्त्रियाँ शामिल हैं। इसमें लोहारिन हैं, अहिरिन हैं, तमोलिनि हैं, दरजिनि
हैं, मोचिनि हैं, मालिनि हैं, बारिनि और नउनिया हैं। सभी दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाएँ हैं। सभी राजा
रानी से परिहास करती हैं। वर्ग-भेद और वर्ण-भेद की सीमा का अतिक्रमण ही राजा दशरथ को
महान और उदार शासक बनाता है। राम के स्वभाव में जो आदर्श हमें दिखाई देता है, वह उनके माता-पिता का संस्कार है। डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र लिखते हैं-
“गोस्वामी जी ने राम के व्यक्तित्व को कौटुम्बिक इकाई और शासकीय इकाई में भी इस
तरह विकसित कर रखा है कि उनका कुटुम्ब एक परम आकर्षक राज्य बन गया है। वह कुटुम्ब
ऐसा नहीं जिसमें जनसाधारण अपने हृदय की आत्मीयता का अनुभव न करता हो और वह राज्य
भी ऐसा राज्य नहीं जिसमें जनसाधारण अपने पूरे विकास की सामग्री न पा रहा हो।”10
रामजी तिवारी लिखते हैं- “तुलसीदास जी सामाजिक जीवन में व्यक्ति, परिवार, समाज और शासन के परस्पर संबंधों में मूल्यधर्मी सामंजस्य की भूमिका को
बार-बार रेखांकित करते हैं।”11
गोसमी तुलसीदास ने ‘नहछू’ संस्कार का ऐसा बिम्ब प्रस्तुत किया है कि
उसका एक-एक दृश्य आँखों के सामने साकार हो उठता है। ऐसा लगता है, मानों सच में राम दूल्हा बने बैठे हैं और उनका विवाह होने वाला है। राजा
दशरथ के घर बाजे बज रहे हैं और देवलोक आनंद से विभोर हो रहे हैं। नगर को दुल्हन की
तरह सजा दिया गया है। वधू के आगमन से जितनी खुशी माँ को होती है, शायद ही किसी को होती हो! यह दृश्य देखकर माता कौशल्या बहुत प्रसन्न हो
रही हैं-
कोटिन्ह
बाजन बाजहिं दशरथ के गृह हो।
देवलोक
सब देखहिं आनंद अति हिय हो॥
नगर
सोहावन लागत बरननि न जातै हो।
कौसल्या
के हरष न हृदय समातै हो॥12
बाँस
के माँड़व छवाना, मोतिन्ह के झालर,
गंगाजल, कलश, गजमुकुता हीरमानि से
सुसज्जित चौका, कनक सरीखे खम्भे, मानिक
दीप आदि एक-एक चीज पर गोस्वामी जी का पूरा ध्यान है। ऐसा लगता है कि नहछू संस्कार
के दौरान कवि स्वयं वहाँ उपस्थित थे और एक-एक चीज को व्यवस्थित कर रहे थे। जैसे-
आल
हि बाँस के माँड़व मनिगन पूरन हो।
मोतिन्ह
झालरि लागि चहूँ दिसि झूलन हो॥
गंगाजल
कर कलश तौ तुरति मँगाइय हो।
जुवतिन्ह
मंगल गाइ राम अन्हवाइस हो॥13
उत्तर
भारत, विशेष रूप से मिथिलांचल के विवाह संस्कार को जानना-समझना हो तो ‘रामलला नहछू’ इसका सुंदर उदाहरण हो सकता है।
विवाह संस्कार के अवसर पर हर जाति की
स्त्रियों को उनके श्रम के लिए आभूषण, वस्त्र, धन, मुद्राएँ आदि दिए जाते हैं। इसमें सबसे
महत्वपूर्ण भूमिका नाई अथवा नाइन की होती है। उनके बिना यह संस्कार पूर्ण नहीं
होता। भारतीय संस्कृति में विवाह, नहछू, पुजापाठ, आज्ञोपवीत आदि संस्कारों में ब्राह्मण के
बाद जिस दूसरी जाति की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है, वह
है नाई। नाई अथवा नाइन बिना पैसे और वस्त्र लिए दूल्हे का नाखून नहीं काटते। उसकी
आमदनी का यह सबसे बड़ा स्रोत होता है। नाखून काटने से पहले वे खूब मान करते हैं और
माँग पूरी होने के बाद ही दूल्हे का नाखून काटते हैं। नाई की भूमिका
वधू के ससुराल आने और गृह प्रवेश करने तक बनी रहती है। इसलिए उसकी हर फरमाइश पूरी की
जाती है। ‘नहछू’ में नाइन का सौन्दर्य
देखते ही बनता है। जैसे-
मोचिन
बदन सँकोचिनि हीरा माँगन हो।
पनहि
लिहे कर सोभित सुंदर आँगन हो॥14
x
x x
नैन
बिसाल नउनिया भौं चमकावइ हो।
देइ
गारि रनिवासहिं प्रमुदित गावइ हो॥15
गोस्वामी जी की नजर ‘नहरनी’ पर है। बहुत कम लोग ‘नहरनी’ के बारे में जानते होंगे। तुलसी पूर्व शायद ही किसी कवि ने ‘नहरनी’ का वर्णन किया हो। अस्तुरा, कैंची, कंघी आदि नाई के श्रम और जीविका का मूलाधार है तो नहरनी नाइन की जीविका का।
नाई समाज में स्त्री-पुरुष दोनों बराबर का श्रम करते हैं। नाई पुरुषों के बाल-दाढ़ी
बनाने का काम करते हैं तो नाइन स्त्रियों के नाखून काटने,
हाथ और पैरों में रंग और महावर लगाने का काम करती हैं। नाइन की पहुँच घर के
कोने-कोने तक होती है। परिवार के अतिरिक्त बाहर के लोगों में नयी नवेली दुल्हिन का
मुख जो सबसे पहले देखती हैं वे नाइन हैं। नयी बहुएँ अपने सुख-दुख की बात जिनसे निःसंकोच
साँझा करती हैं वे नाइन हैं। विवाह, छठी आदि पारिवारिक और
सांस्कृतिक उत्सवों पर नाइन का महत्त्व और आदर अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि बिना उसके
द्वारा विधि सम्पन्न किए कार्य पूर्ण नहीं माना जाता। उसके इस सम्मान-स्वाभिमान का
संबल है नहरनी। यह लोहे का एक बिता लम्बा पेंसिलनुमा औज़ार होता है जो पीछे से
नुकीला और आगे से चपटा और धारदार होता है जिससे नाखून काटा जाता है। छोटी-सी नहरनी
का बड़ा महत्त्व है। इसका वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं-
कनक-चुनिन
सों लसित नहरनी लियकर हो।
आनंद
हिय न समाइ देखि रामहि बर हो॥16
नाइन
रानी की दी हुई साड़ी पहनकर आई है। विवाह के मौके पर सबसे अधिक प्रसन्न नाइन होती
है। उसके जितना सम्मान पिछड़ी जातियों में शायद ही किसी महिला को मिलता हो! वह घर
की एक सदस्या की तरह मानी जाती है। अधिकार से सब कुछ माँगती है और वह पूरी भी की
जाती है। पिछड़े वर्ग की इस सुंदर स्त्री का वर्णन हिन्दी में अन्यत्र नहीं मिलता।
गोस्वामी जी लिखते हैं-
कानन
कनक तरीवन, बेसरि सोहइ हो।
गजमुकुता
कर हार कंठमनि माहइ हो॥
कर
कंकन, कटि किंकिनि, नूपुर बाजइ हो।
रानि
कै दीहीं सारी अधिक बिराजइ हो॥17
जिस
पग की धुली के लिए सिद्ध, मुनि तरसते हैं, उसी पग को अधिकार के साथ बड़े गुमान से नाइन धोती है। जिनके चरण स्पर्श से
पत्थर स्त्री बन गई, केवट को जिस चरण को स्पर्श करने के लिए राम
से विनती करनी पड़ी, वह चरण नाइन को सहज ही प्राप्त हो जाता
है। केवट को राम से याचना करनी पड़ी, लेकिन नहछू संस्कार में
वर का पैर धोने के लिए नाइन से आग्रह किया जाता है। जैसे-
जो
पग नाउनि धोवइ राम धोवावइं हो।
सो
पगधूरी सिद्ध मुनि दरसन न पावइं हो॥18
नहछू
संस्कार के बाद सब अपनी-अपनी श्रद्धानुसार नाइन को उपहार भेंट करते हैं। राजा
उन्हें हाथी देते हैं तो रानियाँ हार। उसके हाथ में रखा हुआ सूप उपहारों से भर
जाता है। गाड़ी भरकर नाऊ निवछावर अपने घर ले जाता है। जैसे-
भइ
निवछावरि बहु बिधि जो जस लायक हो।
तुलसीदास
बलि जाऊँ देखि रघुनायक हो॥
राजन
दीन्हें हाथी, रानिन्ह हार हो।
भरि
गे रतनपदारथ सूप हजार हो॥19
गोस्वामी जी ने ‘रामलला नहछू’ के माध्यम से न केवल विवाह संस्कार के
महत्त्व को रेखांकित किया है, बल्कि अत्यंत पिछड़ी जाति की
स्त्री नाइन की महत्ता को भी स्थापित किया है। इस पूरे प्रसंग में राम के बाद कोई
दूसरा महत्त्वपूर्ण पात्र है तो वह नाइन है। यहाँ कोई बड़ा और छोटा नहीं, कोई ऊँच और नीच नहीं, सब एक हैं। ‘रामलला नहछू’ सामाजिक सौहार्द का एक जीवंत सांस्कृतिक
समारोह है। सामाजिक सौहार्द ही है कि राम को सामूहिक रूप से माता के सामने गाली दी
जा रही है और वे शर्म से सकुचा रहे हैं। एक उदाहरण देखिए-
गावहिं
सब रनिवास देहिं प्रभु गारी हो।
रामलला
सकुचाहिं देखि महतारी हो॥
हिलिमिलि
करत स्वाँग सभा रसकेलि हो।
नाउनि
मन हरषइ सुगंधन मेलि हो॥20
बच्चन
सिंह लिखते हैं- “तुलसीदास संबंधी आलोचना का बीजशब्द ‘लोकधर्म’ है। ‘लोकमंगल’ और ‘लोकसंग्रह’ भी
उसी से संबद्ध है। ‘लोकधर्म’ के दो पक्ष हैं- धन पक्ष और ऋण पक्ष। धन पक्ष में
सामाजिकता, सहृदयता आदि का समावेश है तो ऋण पक्ष में वर्णाश्रम
धर्म का।”21 आगे वे लिखते हैं- “तुलसी के राम लोक-पीड़ा के भंजक हैं,
इसलिए वे लोकमंगल के स्रष्टा हैं। वे भिन्न-भिन्न वर्गों के संबंधों को सुखावह
बनाने के लिए लोकसंग्रही हैं।”22 लोकमंगल की यही कामना गोस्वामी
तुलसीदास को अन्य कवियों से श्रेष्ठ बनाती है। “इसमें संदेह नहीं कि तुलसीदास बहुत
बड़े कवि थे। जीवन के जितने आयामों और मार्मिक पक्षों का समावेश उनकी रचना में हुआ
है, वह अन्यत्र नहीं दिखाई देता।”23
डॉ.
रामकुमार वर्मा कहते हैं: “काव्य की दृष्टि से रचना साधारण है। इसमें न तो तुलसी
के समान कवि की उत्कृष्ट प्रतिभा के दर्शन होते हैं और न उसकी भक्ति का दृष्टिकोण
ही मिलता है।”24 साधारण ही सही,
लेकिन ‘नहछू’ संस्कार के सौन्दर्य का उल्लेख करने वाले हिंदी के वे
संभवतः पहले कवि हैं। उत्कृष्ट प्रतिभा का प्रदर्शन तो उन्होंने अपनी श्रेष्ठ कृति
‘रामचरितमानस’
में भी नहीं किया है। ‘मानस’ के ‘बालकांड’ में
उन्होंने स्पष्ट कह दिया है कि ‘कबित बिबेक एक नहिं मोरें’ और ‘कबि न
होउँ नहिं चतुर कहावउँ’। उनका ध्यान काव्य के संसाधनों पर नहीं,
भारतीय संस्कृति पर है। प्रतिभा के चमत्कार पर नहीं,
सामाजिक संस्कार पर है।
संदर्भ-
1.
वर्मा, डॉ.
रामकुमार: हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास; लोक
भारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, 2010 पृष्ठ सं. 358
2.
शुक्ल,
रामचन्द्र, लाला भगवानादीन (सं.): तुलसी ग्रंथावली; काशी
नागरीप्रचारिणी सभा, बनारस, 2004, पृष्ठ सं. 4
3.
वर्मा, डॉ.
रामकुमार: हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास; लोक
भारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, 2010 पृष्ठ सं. 358
4.
शुक्ल, रामचन्द्र:
हिंदी साहित्य का इतिहास; प्रकाशन
संस्थान, नयी दिल्ली, 2014, पृष्ठ सं. 113
5.
शुक्ल,
रामचन्द्र, लाला भगवानादीन (सं.): तुलसी ग्रंथावली; काशी
नागरीप्रचारिणी सभा, बनारस, 2004, पृष्ठ सं. 4
6.
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7.
वही,
8.
वर्मा, डॉ.
रामकुमार: हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास; लोक
भारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, 2010 पृष्ठ सं. 357
9.
गोस्वामी तुलसीदास (बा. श्यामसुंदर दास,
पीतांबरदत्त बड़थ्वाल); हिन्दुस्तानी एकेडमी,
इलाहाबाद, 1931, पृष्ठ सं. 96
10. मिश्र, डॉ. बलदेव प्रसाद: भारतीय संस्कृति को गोस्वामी
तुलसीदास का योगदान; नागपुर विश्वविद्यालय,
नागपुर, 1953, पृष्ठ सं. 68
11. तिवारी,
रामजी: गोस्वामी तुलसीदास; साहित्य अकादेमी, नयी
दिल्ली, 1998, पृष्ठ सं. 65
12. शुक्ल,
रामचन्द्र, लाला भगवानादीन (सं.): तुलसी ग्रंथावली; काशी
नागरीप्रचारिणी सभा, बनारस, 2004, पृष्ठ सं. 3
13. वही,
14. वही,
पृष्ठ सं. 4
15. वही,
16. वही,
17. वही,
18. वही,
19. वही,
पृष्ठ सं. 5
20. वही,
21. सिंह,
बच्चन: हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास;
राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1996, पृष्ठ सं. 392
22. वही,
23. वही,
पृष्ठ सं. 392-393
24. वर्मा, डॉ.
रामकुमार: हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास; लोक
भारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, 2010 पृष्ठ सं. 359
'जनकृति' पत्रिका के 72-73 अंक में प्रकाशित
रमेश कुमार राज
असिस्टेंट प्रोफेसर (तदर्थ)
हिंदी विभाग, हिन्दू कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-110007
Email: rameshdu09@gmail.com
M: 8448971626/8810399646

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