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ध्रुवस्वामिनी नाटक: महत्वपूर्ण कथन

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  ध्रुवस्वामिनी (1933) : जयशंकर प्रसाद महत्वपूर्ण कथन: अंक-1 ·       मैं जानती हूँ कि इस राजकुल के अन्तःपुर में मेरे लिए न जाने कब से नीरव अपमान संचित रहा , जो मुझे आते ही मिला.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       इस राजकुल में एक भी सम्पूर्ण मनुष्यता का निदर्शन न मिलेगा क्या ? जिधर देखो कुबड़े , बौने , हिजड़े , गूंगे और बहरे.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       प्रत्येक स्थान और समय बोलने के योग्य नहीं होते.- (खड्गधारिणी ध्रुवस्वामिनी से) ·       मुझ पर राजा का कितना अनुग्रह है , यह भी मैं आज तक न जान सकी. मैंने तो कभी उनका मधुर सम्भाषण सुना ही ही नहीं. विलासिनियों के साथ मदिरा में उन्मत्त, उन्हें अपने आनंद से अवकाश कहाँ ? - (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       आह! राज-चक्र सबको पीसता है , पिसने दो , हम निस्सहायों को और दुर्बलों को पिसने दो.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       आह! कितनी कठोरता है! मनुष...

चंद्रगुप्त नाटक : महत्वपूर्ण कथन

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  चंद्रगुप्त नाटक (1931) : जयशंकर प्रसाद भूमिका ‘चंद्रगुप्त के समय का भारतवर्ष’ में प्लिनी का उदहारण देते हुए जयशंकर प्रसाद लिखते हैं , “प्लिनी कहता है कि ‘भारतवर्ष में मनुष्य पाँच वर्ग के हैं- एक जो लोग राजसभा में कार्य करते हैं , दूसरे सिपाही , तीसरे व्यापारी , चौथे कृषक और एक पाँचवाँ वर्ग भी है जो कि दार्शनिक कहलाता है.” भूमिका ‘चन्द्रगुप्त का शासन ’ में प्रसाद लिखते हैं कि गंगा के कूल में बने हुए सुंदर राज-मंदिर में चन्द्रगुप्त रहता था और केवल तीन कामों के लिए महल के बाहर आता था- पहला- प्रजा का आवेदन सुनना , जिसके लिए प्रतिदिन एक बार चन्द्रगुप्त को विचारक का आसन ग्रहण करना पड़ता था. दूसरा- धर्मानुष्ठान बलिप्रदान करने के लिए , जो पर्व और उत्सव के उपलक्षों पर होते थे. तीसरा- मृगया खेलने के समय कुंजर पर सवारी निकलती थी. उस समय चन्द्रगुप्त स्त्री-गण से घिरा रहता था , जो धनुर्बाण आदि लिए उसके शरीर की रक्षा करती थीं. चन्द्रगुप्त राजसभा में बैठता था तो चार सेवक आबनूस के बेलनों से उसका अंग-संवाहन करते थे. महत्वपूर्ण कथन अंक-1 ·       आ...