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यह देशभक्ति है या सत्ताभक्ति?

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'यह देशभक्ति है या सत्ताभक्ति?' यह सवाल आज भी सुरसा की तरह मुँह फाड़े खड़ा है। सुभद्रा कुमारी चौहान ने यह सवाल 1947 में प्रकाशित अपनी कहानी 'राही' में किया है। तब से लेकर आज तक सत्ता के चरित्र में कितना बदलाव आया है? यह तो नहीं कह सकते कि आजादी के बाद से लेकर अब तक इस देश में कोई काम नहीं हुआ है। देश ने कोई तरक्की नहीं की है। यह बेवकूफों और जाहिलों का काम है, जो यह सोचते हैं कि पिछले 'इतने' सालों से पूर्व के नेताओं ने देश के लिए कुछ नहीं किया है। हवेली में एसी वाले कमरे के मखमली सोफे पर बैठकर आप बाप से यह नहीं पूछ सकते कि उन्होंने आपके लिए किया क्या है?       1947 में जब देश आजाद हुआ था तब इस देश के पास क्या था? इसकी आर्थिक स्थिति क्या थी? रोजगार और आय के स्रोत क्या थे? बिल्कुल जर्जर हालत में देश देशवासियों को मिला था। अंग्रेज इसे दीमक की तरह चूसकर गए थे। इस देश को पुनर्जीवित, पुनः व्यवस्थित करने के लिए भारतीय जमींदारों और उद्योगपतियों ने अपनी-अपनी जमीनें दीं, धन-संसाधन देकर जितना उनसे हो सकता था, उन्होंने पूरी मदद की। लेकिन यह देश के विकास के लिए पर्य...

भारतीय रेलवे की कानूनन वसूली

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पिछले कुछ दिनों से रेलवे टिकट के लिए परेशान था। भारतीय रेलवे के आधिकारिक ऐप आईआरसीटीसी पर एक-डेढ़ महीने के भीतर दूर-दूर तक कहीं कोई कन्फर्म टिकट उपलब्ध नहीं है। हर जगह वेटलिस्ट दिखा रहा है। मैंने सोचा कि रेलवे में काम कर रहे मित्र से मदद लेते हैं। मैंने उसे फोन किया। उसने मुझे जो बताया उसे सुनकर बहुत हैरानी हुई। मित्र ने कहा, "अब स्टाफ कोटा हटा दिया गया है। पहले वाला सिस्टम अब खत्म हो गया है, जब किसी के कहने से वेटलिस्ट टिकट कन्फर्म हो जाता था। हमलोग भी अब 'कन्फर्म टिकट ऐप' से टिकट कटाते हैं। कन्फर्म टिकट ऐप पर टिकट कटाने से टिकट के कन्फर्म होने की पूरी संभावना रहती है। वह ज्यादा पैसा इसीलिए चार्ज करता है। टिकट कन्फर्म नहीं करेगा तो उसे तीन गुना पैसा वापस करना होगा। यदि वह ज्यादा पैसा लेकर टिकट दे रहा है तो टिकट ले लो। उसके पास सीट होती है। टिकट कन्फर्म हो जाता है।"         कन्फर्म टिकट ऐप यह दावा करता है कि वह टिकट कन्फर्म कर देगा। लेकिन इसके लिए वह अलग-अलग कोच के लिए अलग-अलग अतिरिक्त पैसा चार्ज करता है। मैं दो उदाहरण देता हूँ- पहला, गरीबरथ का किराया 1150...

ध्रुवस्वामिनी नाटक: महत्वपूर्ण कथन

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  ध्रुवस्वामिनी (1933) : जयशंकर प्रसाद महत्वपूर्ण कथन: अंक-1 ·       मैं जानती हूँ कि इस राजकुल के अन्तःपुर में मेरे लिए न जाने कब से नीरव अपमान संचित रहा , जो मुझे आते ही मिला.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       इस राजकुल में एक भी सम्पूर्ण मनुष्यता का निदर्शन न मिलेगा क्या ? जिधर देखो कुबड़े , बौने , हिजड़े , गूंगे और बहरे.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       प्रत्येक स्थान और समय बोलने के योग्य नहीं होते.- (खड्गधारिणी ध्रुवस्वामिनी से) ·       मुझ पर राजा का कितना अनुग्रह है , यह भी मैं आज तक न जान सकी. मैंने तो कभी उनका मधुर सम्भाषण सुना ही ही नहीं. विलासिनियों के साथ मदिरा में उन्मत्त, उन्हें अपने आनंद से अवकाश कहाँ ? - (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       आह! राज-चक्र सबको पीसता है , पिसने दो , हम निस्सहायों को और दुर्बलों को पिसने दो.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       आह! कितनी कठोरता है! मनुष...

चंद्रगुप्त नाटक : महत्वपूर्ण कथन

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  चंद्रगुप्त नाटक (1931) : जयशंकर प्रसाद भूमिका ‘चंद्रगुप्त के समय का भारतवर्ष’ में प्लिनी का उदहारण देते हुए जयशंकर प्रसाद लिखते हैं , “प्लिनी कहता है कि ‘भारतवर्ष में मनुष्य पाँच वर्ग के हैं- एक जो लोग राजसभा में कार्य करते हैं , दूसरे सिपाही , तीसरे व्यापारी , चौथे कृषक और एक पाँचवाँ वर्ग भी है जो कि दार्शनिक कहलाता है.” भूमिका ‘चन्द्रगुप्त का शासन ’ में प्रसाद लिखते हैं कि गंगा के कूल में बने हुए सुंदर राज-मंदिर में चन्द्रगुप्त रहता था और केवल तीन कामों के लिए महल के बाहर आता था- पहला- प्रजा का आवेदन सुनना , जिसके लिए प्रतिदिन एक बार चन्द्रगुप्त को विचारक का आसन ग्रहण करना पड़ता था. दूसरा- धर्मानुष्ठान बलिप्रदान करने के लिए , जो पर्व और उत्सव के उपलक्षों पर होते थे. तीसरा- मृगया खेलने के समय कुंजर पर सवारी निकलती थी. उस समय चन्द्रगुप्त स्त्री-गण से घिरा रहता था , जो धनुर्बाण आदि लिए उसके शरीर की रक्षा करती थीं. चन्द्रगुप्त राजसभा में बैठता था तो चार सेवक आबनूस के बेलनों से उसका अंग-संवाहन करते थे. महत्वपूर्ण कथन अंक-1 ·       आ...