ध्रुवस्वामिनी नाटक: महत्वपूर्ण कथन
ध्रुवस्वामिनी (1933) : जयशंकर प्रसाद महत्वपूर्ण कथन: अंक-1 · मैं जानती हूँ कि इस राजकुल के अन्तःपुर में मेरे लिए न जाने कब से नीरव अपमान संचित रहा , जो मुझे आते ही मिला.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) · इस राजकुल में एक भी सम्पूर्ण मनुष्यता का निदर्शन न मिलेगा क्या ? जिधर देखो कुबड़े , बौने , हिजड़े , गूंगे और बहरे.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) · प्रत्येक स्थान और समय बोलने के योग्य नहीं होते.- (खड्गधारिणी ध्रुवस्वामिनी से) · मुझ पर राजा का कितना अनुग्रह है , यह भी मैं आज तक न जान सकी. मैंने तो कभी उनका मधुर सम्भाषण सुना ही ही नहीं. विलासिनियों के साथ मदिरा में उन्मत्त, उन्हें अपने आनंद से अवकाश कहाँ ? - (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) · आह! राज-चक्र सबको पीसता है , पिसने दो , हम निस्सहायों को और दुर्बलों को पिसने दो.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) · आह! कितनी कठोरता है! मनुष...