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लघुकथा: बच्चे ही तो हैं

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ट्रेन के अंदर खिड़की वाली सीट पर बैठा हूँ। खिड़की पर हाथ है। हाथ पर सिर है। बाहर घनघोर अंधेरा है। कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। सिर्फ सुनाई दे रही है, ट्रेन की खटखट, सरसराती हवाएँ। ट्रेन हवा को चीरती हुई सरपट दौड़ रही है। हवा कानों में शोर मचा रही है। मेरे बालों को लहराती हुई मानों मुझसे यह कह रही हो, "तुम मुझसे तेज नहीं भाग सकते।"         मैं जिस जगह पर बैठा हूँ, उस हिस्से में मेरी सीट को छोड़कर सभी सीटों पर मुस्लिम यात्री बैठे हुए हैं। दो-तीन महिलाएं हैं। चार-पाँच छोटे-छोटे बच्चे हैं। करीब इतने ही जवान मर्द भी हैं। बच्चे कभी इस सीट पर तो कभी उस सीट पर पक्षियों की तरह चहचहाते हुए फुदक रहे हैं। एक यात्री ने मुझसे पूछा, "आपको कोई दिक्कत तो नहीं हो रही है?" "नहीं। कोई बात नहीं। बच्चे ही तो हैं।" मैंने जवाब दिया। फिर भी उसने अपने बच्चे को डांटा, "शांति से बैठो, वरना मार खाओगे।" बच्चे मार खाने से कब डरे हैं? जिस चीज के लिए मना करो, वही करते हैं।         एक यात्री बड़ी-सी थैली में सबके लिए खाना लेकर आया। चार छोटे-छोटे खाने वाले खाने के पैकेट हैं। उ...

नयी सियासी चाल

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राघव चड्डा आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गया। या फिर यों कहिए कि 'आम आदमी पार्टी' द्वारा पार्टी से बहिष्कृत किए जाने के बाद राघव चड्डा ने खुद को भारतीय जनता पार्टी में विलय कर लिया है। वह खुद तो गया ही है, अन्य लोगों को भी साथ में लेकर गया है। कुछ लोग इसे उसकी राजनीतिक सूझबूझ बता रहे हैं तो कोई इसे राघव चड्डा की नासमझी, अवरवादिता और विश्वासघात कह रहे हैं।        जनता राघव से खासा नाराज है। कुछ दिन पहले जब राघव चड्डा टेलीकॉम कंपनी की लूट, सस्ते चाय, समोसे और पानी के बोतल की बात कर रहे थे, तो लोगों को लगने लगा था कि वह जनता के बीच का आदमी है। देखते-ही-देखते राघव चड्डा चमकने लगा था। उसने मीडिया मैनेज ऐसे किया कि जनता में लोकप्रिय होने लगा। इंस्टाग्राम और फेसबुक पर उसको चाहने वालों की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन राघव चड्डा इसे सम्भाल नहीं पाया और बहुत जल्द ही जनता का विश्वास तोड़ दिया। भाजपा में आज उसका जो भी सम्मान हो, जो भी जगह उसे मिल रही हो, लेकिन जनता की नजरों से वह गिर गया है। लोगों ने उसे अपने दिल से निकालकर बाहर फेकना शुरू कर दिया है। उसके चाहने व...

लघुकथा: गद्दार कौन हैं?

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मंच सजकर तैयार है। मंत्रीजी को देखने के लिए जनता मैदान में पहुँच चुकी है। चारों तरफ मंत्रीजी की पार्टी का पताका लहरा रहा है। कार्यकर्ता मुस्तैदी से पहरा दे रहे हैं। पुलिस बंदूक लिए चप्पे-चप्पे पर तैनात है। छूटभैय्ये मंत्री मंच को संभाले हुए हैं। भाषण दे रहे हैं, "जो भी भारतमाता की तरफ आँख उठाकर देखेगा, हम उसकी आँख निकाल लेंगे। एक-एक गद्दार को चुन-चुनकर पाकिस्तान भेजेंगे।" जनता के बीच से आवाज आती है, "भारतमाता की जय", "वंदेमातरम।"       रामप्रसाद को एक बोतल दारू और पाँच सौ रुपया का भरोसा दिलाकर गाँव का सरपंच मंत्रीजी का भाषण सुनाने लाया है। उसके साथ और भी लोग हैं। आते वक्त पूरा ट्रैक्टर भरा हुआ था। मुखियाजी तो दस ट्रैक्टर भरकर आए हैं। रामप्रसाद ने अपने पड़ोसी से पूछा, "नेताजी गद्दार किसको बोल रहे हैं?" "मुल्ले को" पड़ोसी ने तपाक से जवाब दिया। "ऐसे ही मुल्लों की संख्या बढ़ती रही तो एक दिन हमें यह देश छोड़ना पड़ेगा।" उसने आगे कहा। रामप्रसाद चुप हो गया।       मंत्रीजी साधु के वेश में आए। आते ही 'जयश्रीराम' का जोर से...

लघुकथा: एक हाथ का मियॉं, सवा हाथ की दाढ़ी

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बचपन में माँ एक कहानी सुनाया करती थी। कहानी का नाम था, 'एक हाथ का मियाँ, सवा हाथ की दाढ़ी'। छोटे बच्चों को यह कहानी बेहद पसंद थी। जैसे आज के बच्चों को 'छोटा भीम, 'डोरेमॉन' का खूब चस्का है, ठीक वैसे ही। शाम होते ही हम सभी बच्चे उस ठिगने मियॉं के किस्से सुनने के लिए बेताब हो जाते थे। दरबाजे पर चटाई बिछाकर बच्चे बैठे रहते थे, ताकि माँ अपने सभी कामों से निवृत होकर हमें कहानी सुनाए। उसकी हर आहट पर हम झाँकर कमरे में देखते थे कि माँ का काम कहीं खत्म तो नहीं हो गया। जब तक माँ नहीं आ जाती थी तब तक हम बच्चे आपस में बातें करते रहते थे- 'लगता है, मियाँ दाढ़ी नहीं कटाता था'। 'वह तो कुएँ में रहता था। दाढ़ी कैसे कटाता?' 'मियॉं चलता होगा तो दाढ़ी पर पैल पल जाता होगा। फिल तो वह मुँह के बल गिलता होगा।'  तोतले की आवाज सुनकर हम सभी बच्चे पेट पकड़कर खूब हँसते थे।           माँ जैसे ही सभी काम खत्म करके आती वैसे ही हम सभी बच्चे उसके सामने पालथी मारकर बैठ जाते थे। जैसे किसी आश्रम में गुरु के सामने शिष्य बैठे रहते थे, ठीक वैसे ही। "एक राजा था" माँ क...

भूख

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"पढ़ा-लिखा व्यक्ति यदि किसी अनपढ़ और आपराधिक चरित्रवाले नेता की चमचागिरी करने लगे तो समझना चाहिए कि या तो उसकी भूख बहुत बड़ी है या फिर वह स्वयं उसी मानसिकता का व्यक्ति है।" "और जो अपराध पर मौन रहे वो?" "वह या तो अवसरवादी है या रीढ़विहीन। दोनों की कोई तीसरी गति नहीं है।" "मौन से याद आया, अज्ञेय तो मौन को भी सच की अभिव्यक्ति मानते थे।" "ठीक ही बात तो है। अरे भाई! सच का मतलब सिर्फ न्याय के पक्ष में ही खड़ा होना तो नहीं होता है। यह भी तो हो सकता है कि शोषक-शोषण के प्रति व्यक्ति की मौन स्वीकृति हो। है कि नहीं? वैसे जहाँ तक अज्ञेय की बात है, तो मुझे नहीं लगता है कि उन्होनें कभी खुलकर जन पक्षधरता की बात की होगी।" "तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? तुम एक बड़े रचनाकार की प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े कर रहे हो।" "सवाल तो है ही मेरे मन में।" "कैसा सवाल?" "यही कि शोषितों, पीड़ितों की बात करनेवाली प्रगतिवादी कविता का विरोध उन्होंने क्यों किया? मुझे लगता है कि अज्ञेय बुर्जुआ वर्ग के हिमायती थे। एक और बात है, जिसके कारण अज...

खाली जमीन

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बंद कमरे में मंत्रीजी और सबसे बड़े उद्योगपति के बीच मीटिंग चल रही थी। उद्योगपति छोटे शहर में अपना पैर पसारना चाहते थे। उसने मंत्रीजी से कहा, "मुझे इस छोटे टाउन को शहर की तरह चमकाने के लिए करीब सौ एकड़ जमीन चाहिए। बदले में आपको जो चाहिए मैं देने को तैयार हूँ। कभी किसी सांसद-विधायक को खरीदना-तोड़ना हो तो वह भी हो जाएगा। आप हमें जमीन दीजिए, मैं आपको फसल दूँगा।" मंत्रीजी ने अपने सिर पर दो बार हाथ फेरा और कहा, "इंतजाम हो जाएगा। आप टांग पसारने की तैयारी कीजिए। मैं आपके लिए खाली जमीन की व्यवस्था करवाता हूँ।" मीटिंग खत्म हुई। उद्योगपति चले गए। मंत्रीजी ने अपने आदमियों से गाड़ी निकालने के लिए कहा। दस-पंद्रह गाड़ी तैयार हो गई। मंत्रीजी सुरक्षाओं से लैश होकर टाउन के दौड़े पर निकल गए।       मंत्रीजी ने पूरा टाउन छान मारा लेकिन कहीं खाली जमीन नहीं मिली। नदी के किनारे एक बहुत बड़ा जंगली क्षेत्र जरूर था। उसी के कारण टाउन में ऑक्सीजन की थोड़ी-बहुत भरपाई हो रही थी। मंत्रीजी ने जंगल काटना मुनासिब नहीं समझा। उसने अपने असिस्टेंट से कहा, "सभी जगह के जंगल तो कट ही रहे हैं। लेकिन...

लघुकथा: शातिर चोर

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सुबह के सात बज रहे थे। मैं हाथ में पानी का बोतल लेकर जिम के लिए घर से निकला। बिल्डिंग से उतरकर जैसे ही नीचे आया तो देखा कि चौराहे पर भीड़ लगी हुई है। घर के ठीक बगल में चौराहा है। चौराहे को एक पतला किंतु विषैला नाला काटता है। वहाँ एक छोटी-सी पुलिया है, जिसके ऊपर से होकर पूर्व-पश्चिम की ओर बीस फुटिया सड़क गई है।        मैं जब भीड़ के पास गया तो देखा कि वहाँ दो-चार पुलिस भी हाथ में डंडा लिए खड़ी है। मेरी नजर 'राजन इलेक्ट्रिक दुकान' पर पड़ी। उसका शटर बीच में ऊपर की तरफ सिकुड़ा हुआ था। थोड़ी ही देर में सब समझ में आ गया कि दुकान में चोरी हुई है। "कितने बजे की घटना है?" मैंने एक आदमी से पूछा। वह व्यक्ति जवाब देता इससे पहले ही एक पुलिस ने डंडे से सबको हड़काया- "हटो यहाँ से। भीड़ खाली करो।" लोग इधर-उधर खिसक गए। मैं भी वहाँ से दस कदम दूर जाकर खड़ा हो गया।          मैं देख रहा हूँ कि दुकान का शटर सिकुड़ा हुआ है। अंदर में शीशे बिखड़े पड़े हैं। चोरों ने अंदर वाला शीशे के दरबाजा तोड़ दिया है। अंदर मीडिया वाला कैमरा लेकर एक-एक चीज की फोटो खींच रहा है। दुकानदा...