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लघुकथा: एक हाथ का मियॉं, सवा हाथ की दाढ़ी

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बचपन में माँ एक कहानी सुनाया करती थी। कहानी का नाम था, 'एक हाथ का मियाँ, सवा हाथ की दाढ़ी'। छोटे बच्चों को यह कहानी बेहद पसंद थी। जैसे आज के बच्चों को 'छोटा भीम, 'डोरेमॉन' का खूब चस्का है, ठीक वैसे ही। शाम होते ही हम सभी बच्चे उस ठिगने मियॉं के किस्से सुनने के लिए बेताब हो जाते थे। दरबाजे पर चटाई बिछाकर बच्चे बैठे रहते थे, ताकि माँ अपने सभी कामों से निवृत होकर हमें कहानी सुनाए। उसकी हर आहट पर हम झाँकर कमरे में देखते थे कि माँ का काम कहीं खत्म तो नहीं हो गया। जब तक माँ नहीं आ जाती थी तब तक हम बच्चे आपस में बातें करते रहते थे- 'लगता है, मियाँ दाढ़ी नहीं कटाता था'। 'वह तो कुएँ में रहता था। दाढ़ी कैसे कटाता?' 'मियॉं चलता होगा तो दाढ़ी पर पैल पल जाता होगा। फिल तो वह मुँह के बल गिलता होगा।'  तोतले की आवाज सुनकर हम सभी बच्चे पेट पकड़कर खूब हँसते थे।           माँ जैसे ही सभी काम खत्म करके आती वैसे ही हम सभी बच्चे उसके सामने पालथी मारकर बैठ जाते थे। जैसे किसी आश्रम में गुरु के सामने शिष्य बैठे रहते थे, ठीक वैसे ही। "एक राजा था" माँ क...

भूख

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"पढ़ा-लिखा व्यक्ति यदि किसी अनपढ़ और आपराधिक चरित्रवाले नेता की चमचागिरी करने लगे तो समझना चाहिए कि या तो उसकी भूख बहुत बड़ी है या फिर वह स्वयं उसी मानसिकता का व्यक्ति है।" "और जो अपराध पर मौन रहे वो?" "वह या तो अवसरवादी है या रीढ़विहीन। दोनों की कोई तीसरी गति नहीं है।" "मौन से याद आया, अज्ञेय तो मौन को भी सच की अभिव्यक्ति मानते थे।" "ठीक ही बात तो है। अरे भाई! सच का मतलब सिर्फ न्याय के पक्ष में ही खड़ा होना तो नहीं होता है। यह भी तो हो सकता है कि शोषक-शोषण के प्रति व्यक्ति की मौन स्वीकृति हो। है कि नहीं? वैसे जहाँ तक अज्ञेय की बात है, तो मुझे नहीं लगता है कि उन्होनें कभी खुलकर जन पक्षधरता की बात की होगी।" "तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? तुम एक बड़े रचनाकार की प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े कर रहे हो।" "सवाल तो है ही मेरे मन में।" "कैसा सवाल?" "यही कि शोषितों, पीड़ितों की बात करनेवाली प्रगतिवादी कविता का विरोध उन्होंने क्यों किया? मुझे लगता है कि अज्ञेय बुर्जुआ वर्ग के हिमायती थे। एक और बात है, जिसके कारण अज...

खाली जमीन

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बंद कमरे में मंत्रीजी और सबसे बड़े उद्योगपति के बीच मीटिंग चल रही थी। उद्योगपति छोटे शहर में अपना पैर पसारना चाहते थे। उसने मंत्रीजी से कहा, "मुझे इस छोटे टाउन को शहर की तरह चमकाने के लिए करीब सौ एकड़ जमीन चाहिए। बदले में आपको जो चाहिए मैं देने को तैयार हूँ। कभी किसी सांसद-विधायक को खरीदना-तोड़ना हो तो वह भी हो जाएगा। आप हमें जमीन दीजिए, मैं आपको फसल दूँगा।" मंत्रीजी ने अपने सिर पर दो बार हाथ फेरा और कहा, "इंतजाम हो जाएगा। आप टांग पसारने की तैयारी कीजिए। मैं आपके लिए खाली जमीन की व्यवस्था करवाता हूँ।" मीटिंग खत्म हुई। उद्योगपति चले गए। मंत्रीजी ने अपने आदमियों से गाड़ी निकालने के लिए कहा। दस-पंद्रह गाड़ी तैयार हो गई। मंत्रीजी सुरक्षाओं से लैश होकर टाउन के दौड़े पर निकल गए।       मंत्रीजी ने पूरा टाउन छान मारा लेकिन कहीं खाली जमीन नहीं मिली। नदी के किनारे एक बहुत बड़ा जंगली क्षेत्र जरूर था। उसी के कारण टाउन में ऑक्सीजन की थोड़ी-बहुत भरपाई हो रही थी। मंत्रीजी ने जंगल काटना मुनासिब नहीं समझा। उसने अपने असिस्टेंट से कहा, "सभी जगह के जंगल तो कट ही रहे हैं। लेकिन...

लघुकथा: शातिर चोर

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सुबह के सात बज रहे थे। मैं हाथ में पानी का बोतल लेकर जिम के लिए घर से निकला। बिल्डिंग से उतरकर जैसे ही नीचे आया तो देखा कि चौराहे पर भीड़ लगी हुई है। घर के ठीक बगल में चौराहा है। चौराहे को एक पतला किंतु विषैला नाला काटता है। वहाँ एक छोटी-सी पुलिया है, जिसके ऊपर से होकर पूर्व-पश्चिम की ओर बीस फुटिया सड़क गई है।        मैं जब भीड़ के पास गया तो देखा कि वहाँ दो-चार पुलिस भी हाथ में डंडा लिए खड़ी है। मेरी नजर 'राजन इलेक्ट्रिक दुकान' पर पड़ी। उसका शटर बीच में ऊपर की तरफ सिकुड़ा हुआ था। थोड़ी ही देर में सब समझ में आ गया कि दुकान में चोरी हुई है। "कितने बजे की घटना है?" मैंने एक आदमी से पूछा। वह व्यक्ति जवाब देता इससे पहले ही एक पुलिस ने डंडे से सबको हड़काया- "हटो यहाँ से। भीड़ खाली करो।" लोग इधर-उधर खिसक गए। मैं भी वहाँ से दस कदम दूर जाकर खड़ा हो गया।          मैं देख रहा हूँ कि दुकान का शटर सिकुड़ा हुआ है। अंदर में शीशे बिखड़े पड़े हैं। चोरों ने अंदर वाला शीशे के दरबाजा तोड़ दिया है। अंदर मीडिया वाला कैमरा लेकर एक-एक चीज की फोटो खींच रहा है। दुकानदा...

यह देशभक्ति है या सत्ताभक्ति?

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'यह देशभक्ति है या सत्ताभक्ति?' यह सवाल आज भी सुरसा की तरह मुँह फाड़े खड़ा है। सुभद्रा कुमारी चौहान ने यह सवाल 1947 में प्रकाशित अपनी कहानी 'राही' में किया है। तब से लेकर आज तक सत्ता के चरित्र में कितना बदलाव आया है? यह तो नहीं कह सकते कि आजादी के बाद से लेकर अब तक इस देश में कोई काम नहीं हुआ है। देश ने कोई तरक्की नहीं की है। यह बेवकूफों और जाहिलों का काम है, जो यह सोचते हैं कि पिछले 'इतने' सालों से पूर्व के नेताओं ने देश के लिए कुछ नहीं किया है। हवेली में एसी वाले कमरे के मखमली सोफे पर बैठकर आप बाप से यह नहीं पूछ सकते कि उन्होंने आपके लिए किया क्या है?       1947 में जब देश आजाद हुआ था तब इस देश के पास क्या था? इसकी आर्थिक स्थिति क्या थी? रोजगार और आय के स्रोत क्या थे? बिल्कुल जर्जर हालत में देश देशवासियों को मिला था। अंग्रेज इसे दीमक की तरह चूसकर गए थे। इस देश को पुनर्जीवित, पुनः व्यवस्थित करने के लिए भारतीय जमींदारों और उद्योगपतियों ने अपनी-अपनी जमीनें दीं, धन-संसाधन देकर जितना उनसे हो सकता था, उन्होंने पूरी मदद की। लेकिन यह देश के विकास के लिए पर्य...

भारतीय रेलवे की कानूनन वसूली

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पिछले कुछ दिनों से रेलवे टिकट के लिए परेशान था। भारतीय रेलवे के आधिकारिक ऐप आईआरसीटीसी पर एक-डेढ़ महीने के भीतर दूर-दूर तक कहीं कोई कन्फर्म टिकट उपलब्ध नहीं है। हर जगह वेटलिस्ट दिखा रहा है। मैंने सोचा कि रेलवे में काम कर रहे मित्र से मदद लेते हैं। मैंने उसे फोन किया। उसने मुझे जो बताया उसे सुनकर बहुत हैरानी हुई। मित्र ने कहा, "अब स्टाफ कोटा हटा दिया गया है। पहले वाला सिस्टम अब खत्म हो गया है, जब किसी के कहने से वेटलिस्ट टिकट कन्फर्म हो जाता था। हमलोग भी अब 'कन्फर्म टिकट ऐप' से टिकट कटाते हैं। कन्फर्म टिकट ऐप पर टिकट कटाने से टिकट के कन्फर्म होने की पूरी संभावना रहती है। वह ज्यादा पैसा इसीलिए चार्ज करता है। टिकट कन्फर्म नहीं करेगा तो उसे तीन गुना पैसा वापस करना होगा। यदि वह ज्यादा पैसा लेकर टिकट दे रहा है तो टिकट ले लो। उसके पास सीट होती है। टिकट कन्फर्म हो जाता है।"         कन्फर्म टिकट ऐप यह दावा करता है कि वह टिकट कन्फर्म कर देगा। लेकिन इसके लिए वह अलग-अलग कोच के लिए अलग-अलग अतिरिक्त पैसा चार्ज करता है। मैं दो उदाहरण देता हूँ- पहला, गरीबरथ का किराया 1150...

ध्रुवस्वामिनी नाटक: महत्वपूर्ण कथन

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  ध्रुवस्वामिनी (1933) : जयशंकर प्रसाद महत्वपूर्ण कथन: अंक-1 ·       मैं जानती हूँ कि इस राजकुल के अन्तःपुर में मेरे लिए न जाने कब से नीरव अपमान संचित रहा , जो मुझे आते ही मिला.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       इस राजकुल में एक भी सम्पूर्ण मनुष्यता का निदर्शन न मिलेगा क्या ? जिधर देखो कुबड़े , बौने , हिजड़े , गूंगे और बहरे.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       प्रत्येक स्थान और समय बोलने के योग्य नहीं होते.- (खड्गधारिणी ध्रुवस्वामिनी से) ·       मुझ पर राजा का कितना अनुग्रह है , यह भी मैं आज तक न जान सकी. मैंने तो कभी उनका मधुर सम्भाषण सुना ही ही नहीं. विलासिनियों के साथ मदिरा में उन्मत्त, उन्हें अपने आनंद से अवकाश कहाँ ? - (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       आह! राज-चक्र सबको पीसता है , पिसने दो , हम निस्सहायों को और दुर्बलों को पिसने दो.- (ध्रुवस्वामिनी खड्गधारिणी से) ·       आह! कितनी कठोरता है! मनुष...