चंद्रगुप्त नाटक : महत्वपूर्ण कथन
चंद्रगुप्त नाटक (1931) : जयशंकर प्रसाद
भूमिका ‘चंद्रगुप्त के समय का भारतवर्ष’ में प्लिनी का उदहारण देते हुए जयशंकर प्रसाद लिखते हैं, “प्लिनी कहता है कि ‘भारतवर्ष में मनुष्य पाँच वर्ग के हैं- एक जो लोग राजसभा में कार्य करते हैं, दूसरे सिपाही, तीसरे व्यापारी, चौथे कृषक और एक पाँचवाँ वर्ग भी है जो कि दार्शनिक कहलाता है.”
भूमिका ‘चन्द्रगुप्त का शासन’ में प्रसाद लिखते हैं कि गंगा के कूल में बने हुए सुंदर राज-मंदिर में चन्द्रगुप्त रहता था और केवल तीन कामों के लिए महल के बाहर आता था-
पहला- प्रजा का आवेदन सुनना, जिसके लिए प्रतिदिन एक बार चन्द्रगुप्त को विचारक का आसन ग्रहण करना पड़ता था.
दूसरा- धर्मानुष्ठान बलिप्रदान करने के लिए, जो पर्व और उत्सव के उपलक्षों पर होते थे.
तीसरा- मृगया खेलने के समय कुंजर पर सवारी निकलती थी. उस समय चन्द्रगुप्त स्त्री-गण से घिरा रहता था, जो धनुर्बाण आदि लिए उसके शरीर की रक्षा करती थीं.
चन्द्रगुप्त राजसभा में बैठता था तो चार सेवक आबनूस के बेलनों से उसका अंग-संवाहन करते थे.
महत्वपूर्ण कथन
अंक-1
· आर्य्यावर्त का भविष्य लिखने के लिए कुचक्र और प्रतारणा की लेखनी और मसि प्रस्तुत हो रही है. उत्तरापथ के खंड-राज्य द्वेष से जर्जर है. शीघ्र भयानक विस्फोट होगा. – (सिंहरण चाणक्य से)
· विनम्रता के साथ निर्भीक होना मालवों का वंशानुगत चरित्र है, और मुझे तो तक्षशिला की शिक्षा का भी गर्व है.- (सिंहरण आम्भीक से)
· ब्राहमण न किसी के राज्य में रहता है और न किसी के अन्न से पलता है; स्वराज्य में विचरता है और अमृत होकर जीता है..... ब्राह्मण सब कुछ सामर्थ्य रखने पर भी, स्वेच्छा से इन माया-स्तूपों को ठुकरा देता है, प्रकृति के कल्याण के लिए अपने ज्ञान का दान देता है.- (चाणक्य आम्भीक से)
· संसार भर की नीति और शिक्षा का अर्थ मैंने यही समझा है कि आत्म-सम्मान के लिए मर मिटना ही दिव्य जीवन है.- (चन्द्रगुप्त चाणक्य से)
· तुम मालव हो और यह मागध, यही तुम्हारे मान का अवसान है न? परन्तु आत्मा-सम्मान इतने से ही संतुष्ट नहीं होगा. मालव और मागध को भूलकर जब तुम आर्य्यावर्त का नाम लोगे, तभी वह मिलेगा.- (चाणक्य सिंहरण से)
· आर्य्य, आपका आशीर्वाद ही मेरा रक्षक है.- (सिंहरण चाणक्य से)
· मनुष्य को अपने जीवन और सुख का भी ध्यान रखना चाहिए.- (अलका सिंहरण से)
· मानव कब दानव से भी दुर्दांत, पशु से भी बर्ब्बर और पत्थर से भी कठोर- करुणा के लिए निरवकाश हृदयवाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता.- (सिंहरण अलका से)
· तू नहीं जानता कि मैं ब्रह्मास्त्र से अधिक इन सुंदरियों के कुटिल कटाक्षों से डरता हूँ.- (नंद अनुचर से)
· तुम कनक किरन के अंतराल में/लुक-छिपकर चलते हो क्यों? (सुवासिनी गाती है. दृश्य-2)
· प्रजा की खोज है किसे?- चाणक्य
· तुम इतना जान लो कि नंद को ब्राह्मणों से घोर शत्रुता है और वह बौद्ध धर्मानुयायी हो गया है.- (प्रतिवेशी चाणक्य से)
· सुवासिनी अभिनेत्री हो गयी- संभवतः पेट की ज्वाला से.- (चाणक्य प्रतिवेशी से)
· मगध! मगध! सावधान! इतना अत्याचार! सहना असंभव है. तुझे उलट दूँगा. नया बनाऊंगा- नहीं तो नाश ही करूँगा.- (चाणक्य प्रतिवेशी से)
· वेश्यायों के लिए भी एक धर्म की आवश्यकता थी, चलो अच्छा ही हुआ. ऐसे धर्म के अनुकूल पतितों की भी कमी नहीं.- (सुवासिनी राक्षस से)
· मुझे विश्वास है कि दुराचारी सदाचार के द्वारा शुद्ध हो सकता है, और बौद्ध मत इसका समर्थन करता है. सबको शरण देता है.- (सुवासिनी राक्षस से)
· मैं देखती हूँ कि महाराज से कोई स्नेह नहीं करता, डरते भले ही हों.- (कल्याणी नीला से)
· महापद्म का जारज-पुत्र नंद केवल शस्त्र-बल और कूटनीति के द्वारा सदाचारों के सिर पर तांडव-नृत्य कर रहा है. वह सिद्धांत-विहीन, नृशंस, कभी बौद्धों का पक्षपाती, कभी वैदिकों का अनुयायी बनकर दोनों में भेदनीति चलाकर बल-संचय करता रहता है. मुर्ख जनता धर्म की ओट में नचायी जा रही है.-( दूसरा ब्रह्मचारी पहले ब्रह्मचारी से)
· केवल सद्धर्म की शिक्षा ही मनुष्यों के लिए पर्याप्त नहीं है.- (राक्षस नंद से)
· परन्तु बौद्धधर्म की शिक्षा मानव-व्यवहार के लिए पूर्ण नहीं हो सकती, भले ही वह संघ-व्यवहार में रहनेवालों के लिए उपयुक्त हो.- (चाणक्य राक्षस से)
· यदि अमात्य ने ब्राह्मण-विनाश करने का विचार किया हो तो जन्मभूमि की भलाई के लिए उसका त्याग कर दें, क्योंकि राष्ट्र का शुभ-चिंतन केवल ब्राह्मण ही कर सकते हैं. एक जिव की हत्या से डरनेवाले तपस्वी बौद्ध, सिर पर मंडरानेवाली विपत्तियों से, रक्त-समुद्र की आंधियों से, आर्य्यावर्त की रक्षा करने में असमर्थ प्रमाणित होंगे.- (चाणक्य राक्षस से)
· राजकुमारी, राजनीति महलों में नहीं रहती, इसे हम लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए.... परीक्षा देकर ही कोई साम्राज्य-नीति समझ लेने का अधिकारी नहीं हो जाता.- (राक्षस कल्याणी से)
· राजाधिराज! मैं जानता हूँ कि प्रमाद में मनुष्य कठोर सत्य का भी अनुभव नहीं करता.- (चाणक्य नंद से)
· समय आ गया है कि शूद्र राजसिंहासन से हटाए जाएँ और सच्चे क्षत्रिय मुर्धाभिषिक्त हो. (चाणक्य नंद से)
· क्या तुम्हारे देश की सभ्यता तुम्हें स्त्रियों का सम्मान करना नहीं सिखाती?- (सिंहरण अलका से)
· जन्मभूमि के लिए ही जीवन है.- (सिंहरण अलका से)
· मैं प्रलय-वन्या के समान अबाध गति और कर्त्तव्य में इंद्र के वज्र के समान भयानक बनूँगा.- चाणक्य
· चाटुकारों के समान हाँ में हाँ मिलाकर, जीवन की कठिनाइयों से बचकर, मुझे भी कुत्ते का पाठ पढ़ाना चाहते हो? भूलो मत, यदि राक्षस देवता हो जाय तो उसका विरोध करने के लिए मुझे ब्राह्मण से दैत्य बनना पड़ेगा.- (चाणक्य वररुचि से)
· ब्राह्मण हो भाई! त्याग और क्षमा के प्रमाण- तपोनिधि ब्राह्मण हो.- (वररुचि चाणक्य से)
· त्याग और क्षमा, तप और विद्या- तेज और सम्मान के लिए है. लोहे और सोने के सामने सिर झुकाने के लिए हम लोग ब्राह्मण नहीं बने हैं. हमारी दी हुई विभूति से हमीं को अपमानित किया जाय, ऐसा नहीं हो सकता. कात्यायन! अब केवल पाणिनि से काम न चलेगा. अर्थशास्त्र और दंड-नीति की आवश्यकता है.- (चाणक्य वररुचि से)
· भाषा ठीक करने से पहले मैं मनुष्यों को ठीक करना चाहता हूँ.- (चाणक्य वररुचि से)
· नीचों के हाथ में इंद्र का अधिकार चले जाने से जो सुख होता है, उसे मैं भोग रहा हूँ.- (चाणक्य वररुचि से)
· कुलपुत्रों के रक्त से आर्य्यावर्त की भूमि सिंचेगी! दानवी बनकर जननी जन्म-भूमि अपनी संतान को खायेगी.- (अलका राजा से)
· बौद्धों के प्रभाव में आने से इनके श्रौत-संस्कार छूट गए हैं अवश्य, परन्तु इनके क्षत्रिय होने में कोई संदेह नहीं. और महाराज! धर्म के नियामक ब्राह्मण हैं, मुझे पात्र देखकर उसका संस्कार करने का अधिकार है. ब्राह्मण एक सार्वभौम शाश्वत बुद्धि-वैभव है. वह अपनी रक्षा के लिए, पुष्टि के लिए, और सेवा के लिए इतर वर्णों का संगठन कर लेगा.- (चाणक्य पर्वतेश्वर से चन्द्रगुप्त के बारे में)
· क्षत्रिय के शस्त्र धारण करने पर आर्त्तवाणी नहीं सुनाई पड़नी चाहिए, मौर्य्य चन्द्रगुप्त वैसा ही क्षत्रिय प्रमाणित होगा.- (चाणक्य पर्वतेश्वर से)
· केवल अभिशाप-अस्त्र लेकर ही तो ब्राह्मण लड़ते हैं. मैं इससे नहीं डरता.- (पर्वतेश्वर चाणक्य से)
· मेरा देश है, मेरे पहाड़ हैं, मेरी नदियाँ हैं और मेरे जंगल हैं. इस भूमि के एकएक परमाणु मेरे हैं और मेरे शरीर के एक-एक क्षुद्र अंश उन्हीं परमाणुओं से बने हैं.- (अलका सिल्यूकस से)
· मेरी आवश्यकताएं परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती है..... जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दंभ नहीं.- (दांड्यायन एनिसाक्रीटीज से)
· यवनों के हाथ स्वाधीनता बेचकर उनके दान से जीने की शक्ति मुझमें नहीं.- (अलका दांड्यायन से)
· विजय-तृष्णा का अंत पराभव से होता है, अलक्षेन्द्र! राजसत्ता सुव्यवस्था से बढे तो बढ़ सकती है, केवल विजयों से नहीं. इसलिए अपनी प्रजा के कल्याण में लगो.- (दांड्यायन सिकंदर से)
· आर्य्य लोग किसी निमंत्रण को अस्वीकार नहीं करते.- (चन्द्रगुप्त सिकंदर से)
अंक-2
· लम्बी यात्रा करके जैसे मैं वहीं पहुँच गयी हूँ, जहाँ के लिए चली थी. यह कितना निसर्ग सुंदर है, कितना रमणीय है!- (कार्नेलिया)
· अरुण यह मधुमय देश हमरा/जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा- (कार्नेलिया गाती है)
· कैसा मधुर गीत है! कार्नेलिया, तुमने भारतीय संगीत पर पूरा अधिकार कर लिया है, चाहे हम लोगों को भारत पर अधिकार करने में अभी विलंब हो. (फिलिप्स कार्नेलिया से)
· यह अद्भुत देश है.- (सिकंदर भारत के बारे में)
· मुझे उस नंगे ब्राह्मण की बातों से बड़ी आशंका हो रही है, भविष्यवाणियाँ प्रायः सत्य होती हैं.- सिकंदर
· सुना है कि मगध का वर्त्तमान शासक एक नीच-जन्मा जारज संतान है. उसकी प्रजा असंतुष्ट है और तुम उस राज्य को हस्तगत करने का प्रयत्न कर रहे हो?- (सिकंदर चन्द्रगुप्त से)
· परन्तु इन्हीं यवनों के द्वारा भारत जो आज तक कभी भी आक्रांत नहीं हुआ है, विजित किया जाएगा.- (सिकंदर चन्द्रगुप्त से)
· मैं मगध का उद्धार करना चाहता हूँ. परन्तु यवन लुटेरों की सहायता से नहीं.- (चन्द्रगुप्त सिकंदर से)
· चन्द्रगुप्त रोटियों के लालच या घृणाजनक लोभ से सिकंदर के पास नहीं आया है.- (चन्द्रगुप्त आम्भीक से)
· पौधे अंधकार में बढ़ते हैं, और मेरी नीतिलता भी उसी भांति विपत्ति-तम में लहलही होगी. हाँ, केवल शौर्य्य से काम नहीं चलेगा.- (चाणक्य सिंहरण से)
· स्त्री की अधीनता वैसे ही बुरी होती है, तिस पर युद्धक्षेत्र में! भगवान ही बचावें.- (सेनापति कल्याणी से)
· मेरा ह्रदय देश की दुर्दशा से व्याकुल है.- (चन्द्रगुप्त कल्याणी से)
· उनसे कह दो कि आज रणभूमि में पर्वतेश्वर पर्वत के समान अचल है. जय-पराजय की चिंता नहीं. इन्हें बतला देना होगा कि भारतीय लड़ना जानते हैं..... धर्मयुद्ध में प्राण की भिक्षा माँगनेवाले भिखारी हम नहीं. जाओ, उन भगोड़ों से एक बार जननी के स्तन्य की लज्जा के नाम पर रुकने के लिए कहो.- (पर्वतेश्वर सिल्यूकस से)
· आज मुझे जय-पराजय का विचार नहीं- मैंने एक अलौकिक वीरता का स्वर्गीय दृश्य देखा है. होमर की कविता में पढ़ी हुई जिस कल्पना से मेरा ह्रदय भरा है, उसे प्रत्यक्ष देखा!- (सिकंदर, पर्वतेश्वर के बारे में चन्द्रगुप्त से)
· वीरता भी एक सुंदर कला है, उस पर मुग्ध होना आश्चर्य की बात नहीं.- (पर्वतेश्वर कल्याणी से)
· मैं सेनापति का पुत्र हूँ, युद्ध ही हमारी आजीविका है.- (चन्द्रगुप्त सैनिक से)
· स्नेह से ह्रदय चिकना हो जाता है. परन्तु बिछलने का भय भी होता है.- (मालविका चंद्रगुत से)
· पराधीनता से बढ़कर विडंबना क्या है? अब समझ गए होगे कि यह संधि नहीं, पराधीनता की स्वीकृति थी.- (अलका पर्वतेश्वर से)
· यवनों की जलसेना पर आक्रमण करना होगा. विजय के विचार से नहीं, केवल उलझाने के लिए और उनकी सामग्री को नष्ट करने के लिए.- (चन्द्रगुप्त सिंहरण से)
· यवन आतंक फैलाना जानते हैं और उसे अपनी रणनीति का प्रधान अंग मानते हैं. निरीह साधारण प्रजा को लूटना, गाँवों को जलाना, उनके भीषण परन्तु साधारण कार्य हैं. (चन्द्रगुप्त सिंहरण से)
· प्राण तो धरोहर है, जिसका होगा वही लेगा, मुझे भय से इनकी रक्षा करने की आवश्यकता नहीं, मैं जानती हूँ.- (मालविका अलका से)
· मालव के ध्वंस पर ही आर्य्यों का यशो-मंदिर ऊँचा खड़ा हो सकेगा.- (सिंहरण सैनिक से)
अंक-3
· एक दिन चाणक्य ने कहा था कि आक्रमणकारी यवन, ब्राह्मण और बौद्ध का भेद न मानेंगे. वही बात ठीक उतरी. यदि मालव और क्षुद्र परास्त हो जाते और यवन-सेना शतद्रु पार कर जाती तो मगध का नाश निश्चित था.- राक्षस
· भूल थी, मेरी भूल थी! राक्षस- मगध की रक्षा करने चला था! जाता मगध- कटती प्रजा- लूटते नगर. नंद! क्रूरता और मूर्खता की प्रतिमूर्ति नंद- एक पशु! उसके लिए क्या चिंता थी!- (राक्षस चर से)
· चाणक्य विलक्षण बुद्धि का ब्राह्मण है, उसकी प्रखर प्रतिभा कूटराजनीति के साथ रात-दिन जैसे खिलवाड़ किया करती है.- (राक्षस नवागत सैनिक से पत्र लेकर पढ़ता है)
· मरुँ या मार डालूँ. मारना तो असंभव है. सिंहरण और अलका वर-वधू के वेश में हैं, मालवों के चुने हुए वीरों से वे घिरे हुए हैं.- (पर्वतेश्वर अकेले टहलते हुए)
· आर्य्य चाणक्य! मैं क्षमता रखते हुए जिस काम को न कर सका, वह कार्य निस्सहाय चन्द्रगुप्त ने किया.- (पर्वतेश्वर चाणक्य से)
· पौरव! ब्राह्मण राज्य करना नहीं जानता, करना भी नहीं चाहता. हाँ, वह राजाओं का नियमन करना जानता है, राजा बनाना जानता है.- (चाणक्य पर्वतेश्वर से)
· मनुष्य अपनी दुर्बलता से भली भांति परिचित रहता है. परन्तु उसे अपने बल से भी अवगत होना चाहिए.- (चाणक्य पर्वतेश्वर से)
· अतीत की कारा में बंदिनी स्मृतियाँ अपने करुण निःश्वास की श्रृंखलाओं को झनझनाकर सूचिभेद्य अंधकार में सो जाती हैं.- (कार्नेलिया चन्द्रगुप्त से)
· मुझे इस देश से जन्मभूमि के समान स्नेह होता जा रहा है.- (कार्नेलिया चन्द्रगुप्त से, दूसरे दृश्य में)
· सिकंदर ने भारत से युद्ध किया है और मैंने भारत का अध्ययन किया है. मैं देखती हूँ कि यह ग्रीक और भारतीयों के अस्त्र का ही नहीं, इसमें दो बुद्धियाँ भी लड़ रही हैं. यह अरस्तू और चाणक्य की चोट है, सिकंदर और चन्द्रगुप्त तो उनके अस्त्र हैं.- (कार्नेलिया चन्द्रगुप्त से)
· शत्रु की उचित प्रशंसा करना मनुष्य का धर्मं है.- (राक्षस चाणक्य से)
· अत्याचारी नंद के हाथों से मगध का उद्धार करने के लिए चाणक्य ने तुम्हीं से पहले सहायता माँगी थी और अब तुम्हीं से लेगा भी- अब तो तुम्हें विश्वास होगा?- (चाणक्य पर्वतेश्वर से)
· जिस समय तुम भारत के सम्राट होगे, उस समय मैं उपस्थित न रह सकूँगा, उसके लिए पहले से बधाई.- (सिकंदर चन्द्रगुप्त से)
· आर्य्य वीर! मैंने भारत में हरक्यूलिस, एचिलिस की आत्माओं को भी देखा है और देखा है डिमास्थनीज को. प्लेटो और अरस्तू भी होंगे. मैं भारत का अभिनंदन करता हूँ.- (सिकंदर चन्द्रगुप्त से)
· धन्य हैं आप. मैं तलवार खींचे हुए भारत में आया, ह्रदय देकर जाता हूँ. विस्मय-विमुग्ध हूँ. जिनसे खड्ग परीक्षा हुई थी, युद्ध में जिनसे तलवारें मिली थीं, उनसे हाथ मिलाकर- मैत्री के हाथ मिलाकर जाना चाहता हूँ.- (सिकंदर चाणक्य से)
· चन्द्रगुप्त के लिए ये प्राण अर्पित हैं अलके!- (सिंहरण अलका से)
· छल, प्रतारणा, विद्रोह के अभिनय देखते-देखते आँखें जल रही हैं.- (नंद सुवासिनी से)
· कठोर संसार ने सिखा दिया है कि तुम्हें परखना होगा! समझदारी आने पर यौवन चला जाता है- जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं!- (चाणक्य, छठे दृश्य में)
· तुम! सहायता करोगे! आश्चर्य! मनुष्य, मनुष्य की सहायता करेगा! वह उसे हिंसक पशु के समान नोंच न डालेगा! हाँ, यह दूसरी बात है कि वह जोंक की तरह बिना कष्ट दिए रक्त चूसे. जिसमें कोई स्वार्थ न हो, ऐसी सहायता! तुम भूखे भेंड़िये!- (शकटार चाणक्य से)
· राजा प्रजा का पिता है. वही उसके अपराधों को क्षमा करके सुधार सकता है.- (स्त्री नंद से)
· रमणी! राजदंड पति और पुत्र के मोहजाल से सर्वथा स्वतंत्र है, षड्यंत्रकारियों के लिए बहुत निष्ठुर है- निर्मम है- कठोर है, तुम लोग आग की ज्वाला से खेलने का फल भोगो.- (नंद स्त्री से)
· शत्रु से प्रतिशोध लेने के लिए जियो सेनापति! नंद के पापों की पूर्णता ने तुम्हारा उद्धार किया है.- (चाणक्य पर्वतेश्वर मौर्य्य से)
· उत्पीड़न की चिनगारी को अत्याचारी अपने ही अंचल में छिपाये रहता है.- (चाणक्य वररुचि से)
· नंद! तुम्हारे ऊपर इतने अभियोग हैं- महापद्म की हत्या, शकटार को बंदी करना, उसके सातों पुत्रों को भूख से तड़पाकर मारना! सेनापति मौर्य्य की हत्या का उद्योग, उसकी स्त्री और वररुचि को बंदी बनाना! कितनी ही कुलीन कुमारियों का सतीत्व-नाश, नगरभर में व्यभिचार का स्रोत बहाना! ब्रह्मास्व और अनाथों की वृत्तियों का अपहरण! अंत में सुवासिनी पर अत्याचार- शकटार की एकमात्र बची हुई संतान, सुवासिनी जिसे तुम अपनी घृणित पाशव-वृत्ति का..... (चाणक्य नंद की कमियों को उसके सामने ही गिनाता है.)
· ईश्वर ने सब मनुष्यों को स्वतंत्र उत्पन्न किया है, परन्तु व्यक्तिगत स्वतंत्रता वहीं तक दी जा सकती है, जहाँ दूसरों की स्वतंत्रता में बाधा न पड़े. यही राष्ट्रिय नियमों का मूल है.- (चाणक्य, नौवें दृश्य में)
अंक-4
· मेरे जीवन के दो स्वप्न थे- दुर्दिन के बाद आकाश के नक्षत्र विलास-सी चन्द्रगुप्त की छवि और पर्वतेश्वर से प्रतिशोध, किन्तु मगध की राजकुमारी आज अपने ही उपवन में बंदिनी है!- (कल्याणी, मगध के राजकीय उपवन में विहार करती हुई)
· मैं अब सुख नहीं चाहती. सुख अच्छा है या दुःख- मैं स्थिर न कर सकी.- (कल्याणी पर्वतेश्वर के प्रेम प्रस्ताव पर कहती है)
· महत्त्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीपी में रहता है.- (चाणक्य चन्द्रगुप्त से, पहले दृश्य में)
· अमात्य! मैं अनाथ थी, जीविका के लिए मैंने चाहे कुछ भी किया हो, पर स्त्रीत्व नहीं बेचा.- (सुवासिनी राक्षस से)
· यदि ब्याह छोड़कर अन्य किसी भी प्रकार से मैं तुम्हारी हो जाती तो तुम ब्याह से अधिक सुखी होते.- (सुवासिनी राक्षस से)
· विजयों की सीमा है, परन्तु अभिलाषाओं की नहीं! मन उब-सा गया है. झंझटों में घड़ी भर अवकाश नहीं.- चन्द्रगुप्त
· मैं सबसे विभिन्न एक भय-प्रदर्शन-सा बन गया हूँ. मेरा कोई अंतरंग नहीं, तुम भी मुझे सम्राट कहकर पुकारती हो!- (चन्द्रगुप्त मालविका से)
· आप महापुरुष हैं, साधारणजन-सुलभ दुर्बलता न होनी चाहिए आपमें देव!- (सुवासिनी चन्द्रगुप्त से)
· जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना. और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवनसंग्राम! किन्तु भीषण संघर्ष करके भी मैं कुछ नहीं हूँ. मेरी सत्ता एक कठपुतली-सी है.- (चन्द्रगुप्त अकेले टहलते हुए)
· चन्द्रगुप्त! मैं ब्राह्मण हूँ. मेरा साम्राज्य करुणा का था, मेरा धर्म प्रेम का था.- (चाणक्य चन्द्रगुप्त से)
· जाओ, ठीक है- अधिक हर्ष, अधिक उन्नति के बाद ही तो अधिक दुःख और पतन की बारी आती है.- (चन्द्रगुप्त सिंहरण से)
· कात्यायन, तुम सच्चे ब्राह्मण हो! यह करुणा और सौहार्द का उद्रेक ऐसे ही हृदयों में होता है.- (चाणक्य कात्यायन से)
· तुम हंसों मत चाणक्य! तुम्हारा हँसना तुम्हारे क्रोध से भी भयानक है!- (कात्यायन चाणक्य से)
· वर्त्तमान भारत की नियति मेरे ह्रदय पर जलद-पटल में बिजली के समान नाच उठती है.- (चाणक्य कात्यायन से)
· हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती/स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती.- (समवेत स्वर में, छठे दृश्य से)
· मैं देशद्रोही हूँ, नीच-अधम हूँ, तूने गांधार के राजवंश का मुख उज्ज्वल किया है, राज्यासन के योग्य तू ही है.- (आम्भीक बहन अलका से)
· भाई, अब भी तुम्हारा भ्रम नहीं गया! राज्य किसी का नहीं है! सुशासन का है.- (अलका भाई आम्भीक से)
· स्वतंत्रता के युद्ध में सैनिक और सेनापति का भेद नहीं. जिसकी खड्ग-प्रभा में विजय का आलोक चमकेगा, वही वरेण्य है. उसी की पूजा होगी.- (अलका भाई आम्भीक से)
· मित्र आम्भीक! मनुष्य साधारणधर्मा पशु है, विचारशील होने से मनुष्य होता है और निःस्वार्थ कर्म करने से वही देवता भी हो सकता है.- (सिंहरण आम्भीक से)
· सुवासिनी, मैं तुम्हें दंड दूँगा. चाणक्य की नीति में अपराधों के दंड से कोई मुक्त नहीं.- (चाणक्य सुवासिनी से)
· चन्द्रगुप्त युद्ध करना जानता है. और विश्वास रक्खो, उसके नाम का जयघोष विजय-लक्ष्मी का मंगल-गान है.- (चन्द्रगुप्त नायक से)
· राजकुमारी! प्रेम में स्मृति का ही सुख है. एक टीस उठती है, वही तो प्रेम का प्राण है. आश्चर्य तो यह है कि प्रत्येक कुमारी के ह्रदय में वह निवास करती है. पर उसे सब प्रत्यक्ष नहीं कर सकतीं, सबको उसका मार्मिक अनुभव नहीं होता.- (सुवासिनी कार्नेलिया से)
· स्मृति बड़ी निष्ठुर है. यदि प्रेम ही जीवन का सत्य है, तो संसार ज्वालामुखी है.- (कार्नेलिया सुवासिनी से, नौवें दृश्य में)
· मेरा कर्त्तव्य मुझे पुकार रहा है. प्रिये, मैं रणक्षेत्र से भाग नहीं सकता, चन्द्रगुप्त के हाथों प्राण देने में ही कल्याण है!- (राक्षस सुवासिनी से)
· निर्दयी हो चन्द्रगुप्त! मेरे बूढ़े पिता की हत्या कर चुके होगे! सम्राट हो जाने पर आँखें रक्त देखने की प्यासी हो जाती हैं न!- (कार्नेलिया चन्द्रगुप्त से)
· यही तो ब्राह्मण की महत्ता है राक्षस! यों तो मूर्खों की निवृत्ति भी प्रवृत्तिमूलक होती है.- (सुवासिनी राक्षस से)
· कितना गौरवमय आज का अरुणोदय है. भगवान सविता, तुम्हारा आलोक, जगत् का मंगल करे.- (चाणक्य सुवासिनी से)
· न्याय करना तो राजा का कर्त्तव्य है.- (चाणक्य चन्द्रगुप्त से)
· हम भारतीय ब्राह्मणों के पास सबकी कल्याण-कामना के अतिरिक्त और है क्या, जिससे अभ्यर्थना करूँ?- (चाणक्य सिल्यूकस से)
सभी पात्रों के नाम
|
पुरुष पात्र |
स्त्री पात्र |
|
चाणक्य (विष्णुगुप्त), चन्द्रगुप्त, नंद, राक्षस, वररुचि (कात्यायन), शकटार, आम्भीक, सिंहरण, पर्वतेश्वर, सिकंदर, फिलिप्स, मौर्य सेनापति, एनीसाक्रिटीज, देवल, नागदत्त, गणमुख्य, साइबर्टियस, मेगास्थनीज, गांधार-नरेश, सिल्यूकस, दांड्यायन |
अलका, सुवासिनी, कल्याणी, लीला, नीला, मालविका, कार्नेलिया, मौर्य्य-पत्नी, एलिस |
चाणक्य के बहुत-से नाम मिलते हैं- विष्णुगुप्त, कौटिल्य, चाणक्य, वात्स्यायन, द्रामिल इत्यादि. नाटक की भूमिका में जयशंकर प्रसाद लिखते हैं, “जहाँ तक ज्ञात होता है, चाणक्य वेदधर्मावलंबी, कूटनीतिज्ञ, प्रखर प्रतिभावान और हठी थे.”
नाटक में कुल चार अंक है-
· पहले अंक में कुल 11 दृश्य हैं.
· दूसरे अंक में कुल 10 दृश्य हैं.
· तीसरे अंक में कुल 9 दृश्य हैं.
· चौथे अंक में कुल 14 दृश्य हैं.
नाटक में कुल 13 गीत हैं-
· पहले अंक में कुल 2 गीत हैं.
· दूसरे अंक में कुल 3 गीत हैं.
· तीसरे अंक में मात्र 1 गीत है.
· चौथे अंक में कुल 7 गीत हैं.
आवश्यक सूचना:
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