भाषा: नैतिक मूल्य बनाम नैतिक पतन
जब भी कोई भाषायी नैतिकता का पाठ पढाता है , मुझे कबीरदास याद आते हैं. कबीरदास की भाषा के बारे में भी न जाने क्या-क्या कहा गया. किसी ने पंचमेल खिचड़ी कहा तो किसी ने सधुक्कड़ी , संतभाषा और ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहा. डॉ. रामकुमार वर्मा ने दो कदम आगे बढ़कर उनकी भाषा को ‘भद्दी भाषा ’ तक कह दिया. वे लिखते हैं , “ यह बात अवश्य है कि कबीर की कविता में कला का आभाव है. उनकी रचना में पद-विन्यास का चातुर्य नहीं है. उलटबांसियों में क्लिष्ट कल्पना है. भाषा बहुत भद्दी है.” आचार्य रामचंद्र शुक्ल को सबसे ज्यादा कबीरदास की भाषा ही खटकी थी और इसी खटास के कारण शुक्ल ने कबीरदास के बारे न जाने क्या-क्या लिख दिया. मिश्रबंधुओं की कबीर विषयक घृणा साहित्य में प्रचलित है. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को छोड़कर अधिकांश तथाकथित दक्षिणपंथी आलोचकों का कबीर से किनारा स्पष्ट दिखाई पड़ता है. इसका कारण यह है कि कबीरदास शोषण और दमन के खिलाफ मुखर होकर बोलते रहे हैं. ‘पांडे कौन कुमति तोहि लागी’, ‘पंडित बाद बदंते झूठा ’ , ‘जो तू बाभन बभनी जाया , आन बा...