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'प्रवेश परीक्षा ही न्यायोचित है'

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  'प्रवेश परीक्षा ही न्यायोचित है'   दिल्ली विश्वविद्यालय नॉर्थ कैंपस के अध्यापक ने विवादास्पद बयान दिया कि  ‘ केरल बोर्ड जानबूझकर दिल्ली विश्वविद्यालय में वामपंथी विचारधारा थोपने के लिए अपने छात्रों को सौ प्रतिशत अंक देता है। ’  मुझे बाबा नागार्जुन की एक कविता  ‘ सच न बोलना ’  की कुछ पंक्तियाँ स्मरण हो आईं ,   जिसमें वे कहते हैं-  ‘ रोजी रोटी हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा ,  कोई भी हो ,  निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा ’ । बातें तो पुरानी हैं ,  पर नई लगती हैं। क्या अपने अधिकारों की बात करना कम्युनिस्ट होना है ?  व्यवस्था से सवाल करना ,  रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करना कम्युनिस्ट होना है ?  सवाल नहीं होगा तो संवाद कैसे होगा ?  संवाद नहीं होगा तो लोकतंत्र कैसे बचेगा ?  भारत एक लोकतांत्रिक देश है। प्रत्येक मनुष्य तथा सभी धर्मानुयायियों को अपनी बात कहने-सुनने का हक भारत का संविधान उसे देता है। क्या वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था आम नागरिकों को यह छूट देने के पक्ष में नहीं है ?  ...

‘रामलला नहछू’: सामाजिक सौहार्द का सांस्कृतिक समारोह

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  ‘ रामलला नहछू ’ सोहर छंद है , जिसमें 12 , 10 के विश्राम से 22 मात्राएँ होती हैं। ‘ रामलला नहछू ’ की रचना-तिथि का पता वेणीमाधवदास कृत ‘ गोसांई चरित ’ से मिलता है। उसके दोहा संख्या- 94 में लिखा है कि गोस्वामी जी ने इसकी रचना मिथिला प्रदेश में की है। जैसे- मिथिला में रचना किए , नहछू मंगल दोय। मुनि प्राँचे मंत्रित , किए सुख पावें सब कोय॥ इस दोहे के अनुसार तुलसीदास ने ‘ रामलला नहछू ’ की रचना मिथिला यात्रा के दौरान की थी। सीता का संबंध मिथिलांचल से है और राम का पुर्वांचल के नजदीक अयोध्या से। यहाँ केवल दो आत्माओं का ही नहीं , दो संस्कृतियों का भी परस्पर मेल है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी इसका संबंध मिथिला की संस्कृति से जोड़ा है। वे कहते हैं - “इसमें कथा की सत्यता पर न जाकर प्रथा की सत्यता पर जाना चाहिए , राम का नहछू तो एक बहाना है।” 1 गोस्वामी जी ने मिथिला की संस्कृति का वर्णन कर जनकपुर के राजा जनक और जनक जननी सीता के मान की रक्षा की है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने यह आरोप लगाया है कि यदि यह राम के विवाह का नहछू है , तो उसे मिथिला में होना चाहिए , क्योंकि राम विवाह के पूर्व अय...