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अधर्म के खिलाफ धर्म की लड़ाई लड़ता है ‘बंदा’

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घर की नींव और पेड़ों की जड़ मजबूत हो तो बड़ी से बड़ी प्राकृतिक आपदाएँ भी उसे नहीं उखाड़ सकतीं। ठीक उसी तरह झूठ चाहे कितना ही सामर्थ्यवान , बलवान क्यों न हो , यदि सच के लिए लड़ने वाला एक भी अदना-सा कमजोर और साधारण ‘ बंदा ’ अड़ जाए तो उसे धराशायी कर देता है। ‘ सिर्फ एक बंदा काफी है ’ का ‘ बंदा ’ यही करते हुए हमें दिखाई देते हैं। जिस दृढ़ता और निडरता के साथ वे तथाकथित बाबा से लड़ते हैं , वह निडरता डरे हुए समाज को उद्वेलित करती है और भविष्य में भी उसे ललकारती रहेगी।        फिल्म की शुरुआत कमला नगर थाने से होती हैं जहाँ पीड़िता (नु सिंह) अपने माता-पिता के साथ बाबा के खिलाफ शिकायत करने जाती हैं। जिस महिला पुलिस के सामने पीड़िता रोजनामचा भरती है , वह महिला पुलिस अपने सीनियर अधिकारी को फोन चैट के माध्यम से इसकी सूचना देती है। दोनों के बीच हुई बातचीत इस प्रकार है- Sir, come high-profile case. Crime? Rape of minor. POCSO Filling Roznamcha Ok, file FIR after medical examination. इस बातचीत के बाद पीड़िता को मीडिया की भीड़ से बचाते हुए मेडिकल जाँच के लिए भेजा ...

इंसानियत के खिलाफ इंसान की लड़ाई है अवतार-2

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" भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काउ।।" अर्थात ‘ भरत ने यह उचित ही उपाय किया। शत्रु और ऋण को जरा भी शेष नहीं रखना चाहिए। नहीं तो वह बढ़ता ही जाता है। ’ लक्ष्मण को यह संदेह तब हुआ था जब भरत अपनी चतुरंगिणी सेना को लेकर राम से मिलने , उन्हें वापस बुलाने वन की ओर जा रहे थे। लक्ष्मण को लगता है कि भरत अयोध्या को निष्कंटक बनाने के उद्देश्य से उनकी तरफ आ रहे हैं। स्वयं राम भी थोड़े समय के लिए विचलित हुए थे और कहा था- "बहुरि सोचबस भे सियरवनू।कारन कवन भरत आगमनू" अर्थात ‘ क्या कारण है कि सेनाओं को लेकर भरत जंगल की ओर आ रहे हैं ?’ राजनीति विज्ञान का मनोविज्ञान ही यही है कि शत्रु को कभी जीवित नहीं छोड़ना चाहिए। वरना अवसर पाकर वह पलटवार जरूर करता है। ' अवतार: द वे ऑफ वाटर ' की शुरुआत इसी समस्या से होती है। ' अवतार ' में यह लड़ाई जहाँ पर खत्म हुई थी , इसकी शुरुआत वहीं से होती है। पहले भाग में जंगलवासियों ने आकासवासियों पर विजय हासिल की थी और कैदियों को वापस उसके अपने मुल्क भेज दिया था। इस फिल्म में वापस आए वही पराजित कैदी अपनी पूरी ताकत के साथ , पहले ...