लघुकथा: बच्चे ही तो हैं
ट्रेन के अंदर खिड़की वाली सीट पर बैठा हूँ। खिड़की पर हाथ है। हाथ पर सिर है। बाहर घनघोर अंधेरा है। कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। सिर्फ सुनाई दे रही है, ट्रेन की खटखट, सरसराती हवाएँ। ट्रेन हवा को चीरती हुई सरपट दौड़ रही है। हवा कानों में शोर मचा रही है। मेरे बालों को लहराती हुई मानों मुझसे यह कह रही हो, "तुम मुझसे तेज नहीं भाग सकते।"
मैं जिस जगह पर बैठा हूँ, उस हिस्से में मेरी सीट को छोड़कर सभी सीटों पर मुस्लिम यात्री बैठे हुए हैं। दो-तीन महिलाएं हैं। चार-पाँच छोटे-छोटे बच्चे हैं। करीब इतने ही जवान मर्द भी हैं। बच्चे कभी इस सीट पर तो कभी उस सीट पर पक्षियों की तरह चहचहाते हुए फुदक रहे हैं। एक यात्री ने मुझसे पूछा, "आपको कोई दिक्कत तो नहीं हो रही है?" "नहीं। कोई बात नहीं। बच्चे ही तो हैं।" मैंने जवाब दिया। फिर भी उसने अपने बच्चे को डांटा, "शांति से बैठो, वरना मार खाओगे।" बच्चे मार खाने से कब डरे हैं? जिस चीज के लिए मना करो, वही करते हैं।
एक यात्री बड़ी-सी थैली में सबके लिए खाना लेकर आया। चार छोटे-छोटे खाने वाले खाने के पैकेट हैं। उसने थैली से निकालकर एक डब्बा मेरी तरफ भी बढ़ाया। बोला, "नॉनवेज नहीं है। खा लीजिए। ट्रेन की कैंटीन से लेकर आया हूँ।" उसने नॉनवेज वाली बात शायद मेरे गले में लटके रुद्राक्ष के माला को देखकर कही होगी। "मेरे पास खाना है।" यह कहते हुए मैंने भी अपना खाना निकाल लिया। सभी एक साथ किंतु अलग-अलग दिशा में मुँह करके खाने लगे। खाने के बाद मैं फिर से खिड़की पर सिर रखकर हवा से रेस लगाने लगा। तभी एक छोटा-सा बच्चा उठकर आया और खिड़की से खाने का डब्बा ऐसे बाहर फेंका कि डब्बे का पूरा जूठन मेरे हाथ, मुँह और कपड़े पर पड़ गया। "ये तुमने क्या किया?" मैंने इतना कहा ही था कि एक महिला ने बहुत जोर से उसे अपनी तरफ खींच लिया और थप्पड़ मारना चाहा। "छोड़ दीजिए। बच्चा है।" मैंने कहा और जूठन साफ करने लगा।
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