नयी सियासी चाल
राघव चड्डा आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गया। या फिर यों कहिए कि 'आम आदमी पार्टी' द्वारा पार्टी से बहिष्कृत किए जाने के बाद राघव चड्डा ने खुद को भारतीय जनता पार्टी में विलय कर लिया है। वह खुद तो गया ही है, अन्य लोगों को भी साथ में लेकर गया है। कुछ लोग इसे उसकी राजनीतिक सूझबूझ बता रहे हैं तो कोई इसे राघव चड्डा की नासमझी, अवरवादिता और विश्वासघात कह रहे हैं।
जनता राघव से खासा नाराज है। कुछ दिन पहले जब राघव चड्डा टेलीकॉम कंपनी की लूट, सस्ते चाय, समोसे और पानी के बोतल की बात कर रहे थे, तो लोगों को लगने लगा था कि वह जनता के बीच का आदमी है। देखते-ही-देखते राघव चड्डा चमकने लगा था। उसने मीडिया मैनेज ऐसे किया कि जनता में लोकप्रिय होने लगा। इंस्टाग्राम और फेसबुक पर उसको चाहने वालों की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन राघव चड्डा इसे सम्भाल नहीं पाया और बहुत जल्द ही जनता का विश्वास तोड़ दिया। भाजपा में आज उसका जो भी सम्मान हो, जो भी जगह उसे मिल रही हो, लेकिन जनता की नजरों से वह गिर गया है। लोगों ने उसे अपने दिल से निकालकर बाहर फेकना शुरू कर दिया है। उसके चाहने वालों की संख्या अब लगातार घटती जा रही है। राघव चड्डा ने उस कहावत को सच साबित किया है कि जो जितना जल्दी ऊपर चढ़ता है, उतनी ही तेजी से नीचे भी गिरता है। अब राघव चड्डा कुछ भी बन जाए, जनता की निगाह में वह अवसरवादी, जयचंद और मीरजाफ़र ही होंगे।
राघव चड्डा ने पार्टी छोड़ते हुए कहा है कि वह गलत पार्टी में सही आदमी था। राघव चड्डा सही था या नहीं, कह नहीं सकता। उसकी हरकत को देखने से तो यकीन करना मुश्किल है कि वह वाकई सही आदमी है। लेकिन जहाँ तक 'आम आदमी पार्टी' की बात है तो मैं शुरू से 'आप' के कामों को देख रहा हूँ। मुझे अरविंद केजरीवाल या 'आप' के किसी भी बड़े नेताओं के बारे में कोई बुरी खबर नहीं मिली है। 'आप' के कार्यकाल में शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्थाओं में अभूतपूर्व बदलाव हुए हैं। सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूलों को टक्कर देने लगा था। 'मुहल्ला क्लिनिक' ने गरीबों को बेहतर इलाज का अवसर दिया। मुहल्ला क्लिनिक के कई फायदे हैं। जैसे, डॉक्टर को दिखाने की फीस का न लगना, छोटी-छोटी जाँच का मुफ्त में हो जाना, हल्की-फुल्की दवाइयों का मिलना आदि। इसके अतिरिक्त दो अन्य बड़े फायदे भी थे। पहला फायदा यह कि यदि महँगी जाँच को मुहल्ला क्लिनिक द्वारा किसी बड़े प्राइवेट अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता था तो वह जाँच मुफ्त में हो जाती थी। दूसरा फायदा यह कि मुहल्ला क्लिनिक द्वारा रेफर मरीज को बड़े-बड़े अस्पतालों में सीधे भर्ती करना पड़ता था। गरीब जनता के लिए मुहल्ला क्लिनिक वरदान की तरह था।
जिन आरोपों के कारण आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेताओं को जेल में बंद किया गया, अब वे सारे आरोप भी झूठे साबित हो चुके हैं। आम आदमी पार्टी के किसी भी नेता पर अभी तक भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप नहीं लगा है। अरविंद केजरीवाल ने खुद एक इंटरव्यू में कहा है कि वह प्रशासनिक आदमी है। उन्हें प्रशासन चलाना है, राजनीति नहीं करनी है। इसका सीधा-सीधा मतलब यह है कि अरविंद केजरीवाल मूलभूत सुधार करना चाहते हैं और उनके द्वारा किए गए कामों से यह दिखाई भी देता है। अरविंद केजरीवाल पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं। उनकी पार्टी के लगभग सभी शीर्ष नेता, चाहे मनीष सिसोदिया हो, संजय सिंह और आतिशी, सबके पास किसी न किसी कोर्स की प्रामाणिक डिग्री है। लेकिन डिग्री वाले फर्जी डिग्री वालों द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे हैं। सत्ता पर जब अनपढ़ लोग काबिज़ हो जाते हैं तो इसकी कीमत पढ़े-लिखे लोगों को चुकानी ही पड़ती है।
राजनीति में लोग विशेष रूप से दो उद्देश्यों से आते हैं, एक पैसा बनाने और दूसरा काम करने। काम करने वाले नेताओं की संख्या नगण्य हैं। ज्यादातर माल बनाने आते हैं और देश का दुर्भाग्य देखिए कि जहाँ सबसे ज्यादा पैसा है, वहाँ अनपढ़ और भ्रष्ट लोगों का दबदबा है। सौ अनपढ़ों के बीच में एक पढ़ा-लिखा आदमी ठीक वैसे ही है जैसे गुंडों के बीच में रजिया। बहरहाल, जो पैसा बनाने के उद्देश्य से राजनीति में आता है, उसका एक जगह टिकना मुश्किल है। वह नहीं चाहता कि कोई उसकी निगरानी करे, उस पर अपना नियंत्रण रखे। लेकिन जो काम करने के उद्देश्य से राजनीति में आता है वह अपनी ही तरह भरोसेमंद नेताओं की कल्पना करता है। उसके साथ काम करने से खाने का मौका न के बराबर मिलता है। यही कारण है कि भुक्खड़ लोगों के पेट में दर्द होने लगता है और इसी दर्द का मर्ज ढूंढने के लिए सब इधर-उधर मुँह मारना शुरू कर देते हैं। मैं यह तो नहीं कहा जा सकता कि राघव चड्डा पैसे का भूखा आदमी है। लेकिन जिस तरह से वह बयान दे रहा है, उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह आदमी एक नम्बर का झूठा और धोखेबाज है। राघव चड्डा कह रहा है कि आम आदमी पार्टी अब 'वन मैन पार्टी बनकर रह गई है। सारे फैसे अरविंद केजरीवाल लेते हैं और जो भी उनसे सहमत नहीं होते उसे पार्टी छोड़नी पड़ती है। यही कारण है कि वह आम आदमी पार्टी छोड़ रहा है। राघव चड्डा से पूछना चाहिए कि जिस पार्टी में उसने खुद को विलय किया है, उसमें कितने लोगों की चलती है? कितने लोगों से उसकी राय ली जाती है? सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो भाजपा के शीर्ष केंद्रीय मंत्री सिर्फ रबड़ स्टाम्प की तरह काम करते हैं। सारे फैसले प्रधानमंत्री और गृहमंत्री स्वयं लेते हैं। जिस पार्टी के केंद्रीय मंत्रियों का यह हाल हो, उसमें राघव चड्डा जैसे दलबदलू आदमी की क्या दुर्दशा होगी? फिल्मों में दिखाया जाता है कि गद्दारी करने वाले आदमी को उससे काम ले लेने के बाद दूसरा पक्ष भी उसकी हत्या कर देता। क्योंकि वह जानता है कि जो अपनों से गद्दारी कर सकता है, वह किसी के भी साथ गद्दारी कर सकता है। अभी राघव चड्डा को खूब खिलाया-पिलाया जाएगा, उसकी हर जरूरत पूरी की जाएगी। उससे आम आदमी पार्टी के सारे राज उगलवाए जाएँगे। आम आदमी पार्टी के खिलाफ खूब जहर उगलवाया जाएगा। राघव चड्डा भी उस पार्टी को जीभरकर सुनाएगा जिसने उसे पाल पोसकर बड़ा-खड़ा किया है।
राजनीति में दल बदलना कोई नयी बात नहीं है।
एनसीआरटी की किताब में 'आया राम गया राम' नामक अध्याय पढ़ाया जाता था। रामविलास पासवान इसी श्रेणी के नेता रहे हैं। लेकिन इस तरह से किसी दूसरी पार्टी के साथ मर्ज करना कोई विशेष हैरानी वाली बात नहीं है। दो-चार, आठ-दस सांसद-विधायक को लेकर सत्ता से बाहर बैठने से अच्छा है कि सत्ता के साथ मिलकर खुद का और राज्य का विकास किया जाए। लेकिन जिस तरह से राघव चड्डा भाजपा में गया है, अपने अब तक के अनुभव में मैंने ऐसा पहली बार देखा है। यह मेरे लिए 'जिस थाली में खाया उसी में छेद किया' जैसा है। बताया तो यह भी जा रहा है कि राघव चड्डा को ईडी, सीबीआई का डर दिखाकर मैनेज किया गया है। यही कारण है कि राघव चड्डा ने न 'आप' के शीर्ष नेताओं के जेल जाने पर अपना मुँह खोला था और न ही उसके बाहर आने पर कुछ कहा। राघव चड्डा जवान आदमी है, नयी-नयी शादी हुई है। उसने जेल जाने से भाजपा में जाना अच्छा समझा। 'कोई यूहीं बेवफ़ा नहीं हो जाता' शायरी मुझे याद आ रही है। आप भी इस शायरी पर विचार कीजिए।
भाजपा जब से सत्ता में आई है, रोज कोई न कोई नयी चाल चलकर अपने विपक्षी पार्टियों को परेशान कर रही है। कहीं सीबीआई को दौड़ा रही है तो कहीं ईडी की रेड मरवा रही है। भ्रष्टाचार में संलिप्त नेता जेल जाने के डर से समझौता कर ले रहे हैं। जो नेता घुटने नहीं टेक रहा उसको वह जेल में डाल रही है, प्रताड़ित कर रही है। यह तो रही पहली चाल।
अब दूसरी चाल देखिए। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के नाम पर धड़ल्ले से वोट काटे जा रहे हैं। फर्जी वोट जोड़े जा रहे हैं। एक आदमी दो-दो जगह वोट डाल रहा है। एक-एक घर से सौ-सौ लोग वोट डाल रहे हैं। समझ में नहीं आता है कि आठ बाई दस के कमरे में सौ-पचास लोग कैसे रहते हैं। लेकिन रह रहे हैं। वर्षों पुराना कागज, पहचान-पत्र माँगा जा रहा है। जिस जनता ने चुनकर सरकार बनाई है, अब उसी जनता से कहा जा रहा है कि अपनी नागरिकता सिद्ध करो। लोग सिद्ध नहीं कर पा रहे हैं तो सीधे लिस्ट से बाहर किए जा रहे हैं। किसी को कोई खबर नहीं है कि किसका नाम हटाया जा रहा है और किसका नाम छोड़ा-जोड़ा जा रहा है। विपक्षियों का आरोप है कि उसके समर्थकों के वोट काटे जा रहे हैं। राहुल गांधी ने हरियाणा चुनाव के बाद और बिहार चुनाव से पहले पूरा पोथा लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस खेल का पूरा किस्सा सुनाया था।
अब तीसरा चाल देखिए। एक वक्त था जब चुनाव से ठीक पहले पार्टी के लोग रात-रातभर घर-घर पैसा बाँटते थे। वर्ष 2000 के समय मुखिया के चुनाव में एक वोट पर पाँच सौ रुपया दिया जाता था। हर घर में दो-तीन हजार रुपये आ जाते थे। छब्बीस वर्ष बीत गए। वोट की कीमत बढ़ गई है। अब एक वोट का पाँच से दस हजार रुपया दिया जाता है। बस पैसा देने का तरीका बदल गया है। पहले चोरी-चुपके गैरकानूनी तरीके से पैसा बाँटा जाता था। अब वह योजना के रूप में कानूनी तौर पर सरकार के द्वारा सीधे मतदाताओं के खाते में पैसा ट्रांसर किया जाता है। जिसको इस पर लगाम लगाना था, चुनाव जीतने के लिए बेलगाम हो रहे हैं। न्याय करनेवाले ही ही अपराध करने लगे तो इस देश का क्या होगा? 'मधुवन ही आग लगाए तो उसे कौन बुझाए?'
एक और नयी चाल चलने की योजना बनाई जा रही है। यह नयी चाल है सांसदों की संख्या में वृद्धि। यदि यह वृद्धि जनता द्वारा नेता चुने जाने के बाद होती है, तब तो यह कहा जा सकता है कि उसमें थोड़ी-बहुत ईमानदारी बरती भी जाएगी। यदि यह संख्या व्यक्ति विशेष के पसंद से बढ़ाई गई तो फिर यह कहना मुश्किल होगा कि सांसदों का चुनाव पक्षपात रहित होगा। फिर तो अपने लोगों को ही चुना जाएगा जो आने वाले समय में सत्ता पर कायम रहने का जरिया बनेगा। और यदि थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि सांसद निर्वाचित होकर ही आएँगे तो उसकी विश्वसनीयता कितनी होगी? जिस समय निर्वाचन आयोग संदेह के दायरे में हो, सरकार पर वोट चोरी का आरोप लग रहा हो, ऐसे में निर्वाचित सांसदों की जीत पर कोई कैसे भरोसा करेगा? इसलिए मैं यह अनुमान लगा रहा हूँ कि यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि सत्ता में बने रहने की संख्या बराबर बनी रहे। यह मेरा अनुमान है। आरोप नहीं। हो सकता है, मेरी सोच गलत हो। इसे गलत होना ही चाहिए।
अंत में मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि जो भी नेता पैसा कमाने के उद्देश्य से आज भाजपा में शामिल हो रहे हैं, उसकी अधीनता स्वीकार कर रहे हैं, वे कभी भाजपा से मुक्त नहीं हो पाएंगे। भाजपा के अब तक के कामों से यही समझ में आया है कि वह पहले खूब खिलाती है, खजाना खोल देती है और जब आदमी उसमें पूरी तरह डूब जाता है तब वह उसे ब्लैकमेल करने लगती है। जो पार्टी भ्रष्ट नेताओं को जेल का भय दिखाकर अपनी पार्टी में शामिल कर सकती है, वह बाद में अपने ही लोगों के खिलाफ ऐसा नहीं करेगी, इसमें मुझे संदेह है। एक और बात, जो दूसरी पार्टी से चलकर भाजपा में शामिल हुए हैं, हो रहे हैं, वे यदि यह सोचते हैं कि आने वाले समय में वे भाजपा को झटका देकर नुकसान पहुंचाएंगे तो मैं उनसे इतना कह दूं कि ऐसा नहीं होगा। भाजपा वह सब काम कर रही है, जिससे आपके होने न होने से उसको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आप वहाँ मूकदर्शक से ज्यादा कुछ नहीं समझे जाएंगे। भाजपा कांग्रेस या अन्य पार्टियों का मनोबल तोड़ने के लिए जोड़-तोड़ कर रही है। किसी के होने न होने से उसको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मैंने पहले ही कहा था, भाजपा जदयू का ऐसा हाल करेगी कि नीतीश कुमार भाजपा को छोड़ दूसरी किसी भी पार्टी के साथ मिलकर सरकार नहीं बना पाएँगे। आगे भी यही सब होगा।
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