लघुकथा: एक हाथ का मियॉं, सवा हाथ की दाढ़ी
बचपन में माँ एक कहानी सुनाया करती थी। कहानी का नाम था, 'एक हाथ का मियाँ, सवा हाथ की दाढ़ी'। छोटे बच्चों को यह कहानी बेहद पसंद थी। जैसे आज के बच्चों को 'छोटा भीम, 'डोरेमॉन' का खूब चस्का है, ठीक वैसे ही। शाम होते ही हम सभी बच्चे उस ठिगने मियॉं के किस्से सुनने के लिए बेताब हो जाते थे। दरबाजे पर चटाई बिछाकर बच्चे बैठे रहते थे, ताकि माँ अपने सभी कामों से निवृत होकर हमें कहानी सुनाए। उसकी हर आहट पर हम झाँकर कमरे में देखते थे कि माँ का काम कहीं खत्म तो नहीं हो गया। जब तक माँ नहीं आ जाती थी तब तक हम बच्चे आपस में बातें करते रहते थे- 'लगता है, मियाँ दाढ़ी नहीं कटाता था'।
'वह तो कुएँ में रहता था। दाढ़ी कैसे कटाता?'
'मियॉं चलता होगा तो दाढ़ी पर पैल पल जाता होगा। फिल तो वह मुँह के बल गिलता होगा।'
तोतले की आवाज सुनकर हम सभी बच्चे पेट पकड़कर खूब हँसते थे।
माँ जैसे ही सभी काम खत्म करके आती वैसे ही हम सभी बच्चे उसके सामने पालथी मारकर बैठ जाते थे। जैसे किसी आश्रम में गुरु के सामने शिष्य बैठे रहते थे, ठीक वैसे ही। "एक राजा था" माँ के इतना कहते ही बच्चे एक साथ चिल्ला उठते, "नहीं चाची, पहले मियाँ वाली कहानी सुनाओ। उसके बाद राजा-रानी वाली कहानी सुनाना।" माँ एक बीड़ी सुलगाकर मुँह में डाल लेती और कहने लगती, "एक कुएँ में एक हाथ का मिया रहता था। उसकी दाढ़ी उससे भी बड़ी, सवा हाथ की थी। मियाँ बहुत ताकतवर पहलवान था। लेकिन हमेशा रात में कुएँ से बाहर निकलता था। उसने एक हिन्दू स्त्री को जबड़न बंधक बनाकर रखा था। उसका शोषण करता था। जो भी पहलवान उससे लड़ने जाता था, उसे वह हरा देता था।"
"तो वह किसी से नहीं हालता था चाची?" तोतला बोलता।
"नहीं मेले तोताराम!"
"फिल उसको किसने हलाया?"
इस सवाल को पूछने वाले बच्चे को माँ गौर से देखती। रोज कोई न कोई ऐसा बच्चा जरूर आ जाता था, जिसने यह कहानी नहीं सुनी होती थी।
"देखो बेटा, आदमी कितना ही ताकतवर क्यों न हो, उसकी कोई न कोई कमजोरी जरूर होती है। मियाँ की तरह ही रावण को भी लगता था कि उसे कोई नहीं मार पाएगा। लेकिन मारा गया। जानते हो रावण कैसे मरा?"
"कैसे मरा चाची?" सारे बच्चे एक साथ बोले।
"रावण की जान उसकी नाभि में बसती थी और यह बात बिभीषन को मालूम थी। उसने रामजी को बता दी। रामजी ने खींचकर एक वाण रावण की नाभि में दे मारा। रावण मर गया।"
"तो क्या मियाँ की जान भी उसकी नाभि में ही थी चाची?" नए बच्चे ने फिर पूछा। हम बाकी बच्चे उसकी अज्ञानता पर मुग्ध होते थे। क्योंकि हमें कहानी के बारे में पहले से ही सब पता होता था।
"नहीं बेटा! मियाँ की जान उसकी नाभि में नहीं थी। एक तोते में थी। और यह बात उसी के अपने आदमी ने लोगों को बताई। फिर क्या था, लोगों ने उस तोते को पिंजरे से निकालकर मारना शुरू कर दिया। तोते का पंख तोड़ते ही मियाँ के हाथ टूट गए। तोते के पैर टूटते ही मियाँ के पैर टूट गए। फिर सबने तोते की गर्दन मरोड़ दी। मियाँ मर गया। जिसको हार का डर नहीं होता, उसकी जान कहीं और बसी होती है बेटा! समझे?"
"हाँ चाची, सब समझ में आ गया।"
"तो अब दूसरी कहानी सुनो। एक राजा था......!"
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