भूख


"पढ़ा-लिखा व्यक्ति यदि किसी अनपढ़ और आपराधिक चरित्रवाले नेता की चमचागिरी करने लगे तो समझना चाहिए कि या तो उसकी भूख बहुत बड़ी है या फिर वह स्वयं उसी मानसिकता का व्यक्ति है।"
"और जो अपराध पर मौन रहे वो?"
"वह या तो अवसरवादी है या रीढ़विहीन। दोनों की कोई तीसरी गति नहीं है।"
"मौन से याद आया, अज्ञेय तो मौन को भी सच की अभिव्यक्ति मानते थे।"
"ठीक ही बात तो है। अरे भाई! सच का मतलब सिर्फ न्याय के पक्ष में ही खड़ा होना तो नहीं होता है। यह भी तो हो सकता है कि शोषक-शोषण के प्रति व्यक्ति की मौन स्वीकृति हो। है कि नहीं? वैसे जहाँ तक अज्ञेय की बात है, तो मुझे नहीं लगता है कि उन्होनें कभी खुलकर जन पक्षधरता की बात की होगी।"
"तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? तुम एक बड़े रचनाकार की प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े कर रहे हो।"
"सवाल तो है ही मेरे मन में।"
"कैसा सवाल?"
"यही कि शोषितों, पीड़ितों की बात करनेवाली प्रगतिवादी कविता का विरोध उन्होंने क्यों किया? मुझे लगता है कि अज्ञेय बुर्जुआ वर्ग के हिमायती थे। एक और बात है, जिसके कारण अज्ञेय की ईमानदारी के प्रति मुझे संदेह होता है।"
"अब वह कौन-सी बात है?"
"अज्ञेय का मानना था कि लेखक को अपना अनुभूत ही लिखना चाहिए। जो अनुभूति नहीं है, कोरी सैद्धांतिक प्रेरणा के वशीभूत होकर लिखना ऋणशोध हो सकता है, साहित्यिक नहीं। अब तुम ही बताओ, जिसकी उँगली आग में नहीं जलती है, क्या उसे नहीं पता होता है कि आग ज्वलनशील है? चार-पाँच साल का छोटा बच्चा हामीद इस बात को अच्छे-से समझ गया। अज्ञेय को यह बात क्यों समझ में नहीं आई? तुमने ईदगाह पढ़ी है न?"
"पढ़ी तो है भाई।"
"क्या है उसमें?"
"यही जो तुम कह रहे हो?"
"क्या? तुम बताओ।"
"यही कि सीमित संसाधन में आवश्यक चीजों पर ही धन खर्च करना चाहिए।"
"बस यही है?"
"मुझे तो यही लगता है। तुम बताओ।"
"ईदगाह हमें बताती है कि हमें दूसरों की पीड़ा को भी पीड़ित व्यक्ति जैसा ही अनुभव करना चाहिए। चिमटा उसी परपीड़ा की अनुभूति का फल है।"
"मैं इस पर विचार करूँगा। लेकिन अचानक तुम ये भूख वाली बातें क्यों कर रहे हो?"
"इसलिए कि जिसकी कोई औलाद नहीं, उसे लूट-खसोट करने की क्या जरूरत है?"
"तुम किसकी बात कर रहे हो?"
"तुम्हें क्या लगता है?"
"तुम शायद मंत्रीजी के बारे में ऐसा कह रहे हो।"
"आ गए न अपने अनुभव पर! ऐसा नहीं है मेरे भाई! मेरी बात ध्यान से सुन, अभी कुछ ही महीनों पहले एक बड़े उद्योगपति का इकलौता बेटा अमेरिका में मर गया। अब सिर्फ एक बेटी बची है। तुम्हें पता है उसने उड़ीसा में क्या किया है?"
"तुम उड़ीसा के रायगढ़ जिले की बात कर रहे हो?"
"हाँ! पता है न वहाँ क्या हो रहा है?"
"पता तो है यार! बहुत बुरा हो रहा है वहाँ के आदिवासियों के साथ।"
"अच्छा है! कम-से-कम तुम मानते तो हो। बताओ, उस उद्योगपति के पास किस चीज की कमी है? फिर भी लोगों को मार रहा है, उसकी जमीनें हड़प रहा है।"

           यह सुनकर प्रताप सिर पर हाथ रखकर गहरी सोच में डूब गया। उससे इसका जवाब देते नहीं बना। रवि चुपचाप एकटक प्रताप की मुखभाषा को पढ़ रहा है। थोड़ी देर तक दोनों मौन रहे और एक-दूसरे को ताकते रहे। थोड़ी देर बाद रवि ने मुस्कुराते हुए कहा, "भूख आदमी को जानवर ही नहीं बनाती है, उसे यंत्र में भी बदल देती है। यांत्रिक व्यक्ति जमीन, जायदाद, जंगल, पहाड़ सब पचा लेता है। यह भूख आरावली पर्वत को भी निगले वाली थी। लोगों ने उसकी रक्षा की। जनता जब सड़क पर होती है तो सारे भुक्खड़ को घर में दुबकना ही पड़ता है।"

         इतना कहकर रवि ने प्रताप से हाथ मिलाया और वहाँ से चला गया। प्रताप उसे जाते हुए एकटक देखता रहा। रवि चला गया। अब वह दिखाई नहीं दे रहा है।







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