यह देशभक्ति है या सत्ताभक्ति?
'यह देशभक्ति है या सत्ताभक्ति?' यह सवाल आज भी सुरसा की तरह मुँह फाड़े खड़ा है। सुभद्रा कुमारी चौहान ने यह सवाल 1947 में प्रकाशित अपनी कहानी 'राही' में किया है। तब से लेकर आज तक सत्ता के चरित्र में कितना बदलाव आया है? यह तो नहीं कह सकते कि आजादी के बाद से लेकर अब तक इस देश में कोई काम नहीं हुआ है। देश ने कोई तरक्की नहीं की है। यह बेवकूफों और जाहिलों का काम है, जो यह सोचते हैं कि पिछले 'इतने' सालों से पूर्व के नेताओं ने देश के लिए कुछ नहीं किया है। हवेली में एसी वाले कमरे के मखमली सोफे पर बैठकर आप बाप से यह नहीं पूछ सकते कि उन्होंने आपके लिए किया क्या है?
1947 में जब देश आजाद हुआ था तब इस देश के पास क्या था? इसकी आर्थिक स्थिति क्या थी? रोजगार और आय के स्रोत क्या थे? बिल्कुल जर्जर हालत में देश देशवासियों को मिला था। अंग्रेज इसे दीमक की तरह चूसकर गए थे। इस देश को पुनर्जीवित, पुनः व्यवस्थित करने के लिए भारतीय जमींदारों और उद्योगपतियों ने अपनी-अपनी जमीनें दीं, धन-संसाधन देकर जितना उनसे हो सकता था, उन्होंने पूरी मदद की। लेकिन यह देश के विकास के लिए पर्याप्त नहीं था। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विदेशी पूंजी को देश में आमंत्रित किया। व्यक्ति या देश के विकास के लिए पूंजी कितनी आवश्यक है, यह वह बेहतर समझता है जो दूसरों को अपना दास बनाए रखने की मंशा रखता है।
पंडित जवाहर लाल नेहरू को जब सत्ता सौंपी गई, तब साहित्य में ऐसा दौर चल रहा था जो सर्वहारा वर्ग का विरोध और बुर्जुआ वर्ग का समर्थन कर रहा था। मैं बात कर रहा हूँ 'प्रयोगवाद' की, जिसका नेतृत्व अज्ञेय कर रहे थे। अज्ञेय दल के रचनाकारों ने प्रगतिवाद का विरोध करके ही प्रयोगवाद की प्रयोगशाला खोली थी। यह बात अलग है कि इस प्रयोगशाला से जुड़े सातों कवियों में पाँच कवि विशुद्ध रूप से मार्क्सवादी थे। लेकिन मार्क्सवादी रचनाकारों का गांधीवादी विचारधारा से उसी तरह का मतभेद था, जैसा मतभेद गरमदल के राष्ट्रवादियों का था। बावजूद इसके मुक्तिबोध ने प्रारंभ में नेहरू के उद्देश्यों की खूब प्रशंसा की थी। उन पर लेख लिखे थे। लेकिन जब नेहरू ने विदेशी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया तो उन्होंने अपनी नाराजगी भी जाहिर की। 'अंग्रेज गए, परंतु इतनी अंग्रेजी पूंजी क्यों' लेख में मुक्तिबोध लिखते हैं, "भारतीय सरकार ने एक अंग्रेज तथा एक अमेरिकीकंपनी को 60 करोड़ रुपयों की पूंजी से मिट्टी के तेल से पेट्रोल बनाने के दो कारखाने खोलने के लिए विशेष सहूलियतें दीं और यह वचन दिया कि आगामी 25 वर्षों तक उक्त कंपनियों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया जाएगा, और अगर किया गया तो उन्हें मुआवजा दिया जाएगा।" मुक्तिबोध विदेशी कंपनियों को खुली छूट देने के पक्ष में नहीं थे। उन्हें लगता था कि इससे देश पर पुनः विदेशी पूंजीपतियों का कब्जा हो जाएगा। मुक्तिबोध लिखते हैं, "पूंजी दो प्रकार से लगाई जाती है- एक तरीका यह है कि पूंजी लगानेवाला सिर्फ मुनाफा का हकदार होता है। उसका उद्योग के नियंत्रण पर कोई हक नहीं होता। दूसरा तरीका यह है कि उसमें पूंजी लगानेवाला न सिर्फ मुनाफा ही पाता है, वरन् उद्योग की सारी व्यवस्था पर भी उसका अधिकार रहता है। इस तरीके को प्रत्यक्ष पूंजी लगाना, डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट कहते हैं।... विदेशी पूंजीपतियों ने हमारे देश में अपनी अधिकतर पूंजी प्रत्यक्ष पूंजी के रूप में ही लगाई है।" मुक्तिबोध की बातों को यदि सच मान लिया जाए तो यह कहा जा सकता है कि भारत आज़ाद होने के बाद भी आर्थिक रूप से विदेशियों के अधीन ही रहता। भाषाई अधीनता से हम वैसे ही मुक्त नहीं हो पाए थे, ऊपर से यह आर्थिक अधीनता और ओढ़नी पड़ती। पर सवाल यह है कि क्या हम इतने सक्षम थे कि दूसरों पर अपनी शर्ते थोप सकें? देश के विकास के लिए पूंजी की सख्त आवश्यकता थी। पूंजी हमारे पास पर्याप्त थी नहीं। दूसरों से मदद लेनी ही पड़ती। फिर आप ही बताइए कि माँगने वाला देनेवाले के सामने शर्ते कैसे रख सकता है? आप कर्ज भी मांगे और ब्याज देने से भी इनकार करें तो कोई एक फूटी कौड़ी भी देगा? जाहिर-सी बात है कि नहीं देगा। ब्याज की बजाय आप खेत गिरवी रख सकते हैं। जब तक आप कर्ज नहीं लौटा देते तब तक वह आपका खेत जोतता रहेगा। फिलहाल मेट्रो का निर्माण तो इसी शर्त पर हो रहा है। इसलिए विरोध करना और विकास करना दोनों अलग-अलग बातें हैं। आखिर सिद्धांत और व्यवहार में अंतर तो होता ही है।
आज देश उस स्थिति में नहीं है, जिस स्थिति में नेहरू को मिला था। जैसे भी हो सकता था, नेहरू ने विकलांग देश को अपनी टांगों पर खड़ा किया। उसे दौड़ना सिखाया। फिर भी आज हम विदेशी पूंजी के लिए पूरे विश्व का भ्रमण कर रहे हैं। क्यों कर रहे हैं? आज तो हमें किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना चाहिए। फिर भी फैला रहे हैं। क्यों? क्योंकि मसला सिर्फ इन्वेस्टमेंट का ही नहीं है, इंटरनल रिलेशनशिप का भी है। जिस देश का दूसरे समृद्ध देशों से अंतरराष्ट्रीय संबंध जितना बढ़िया है, वह उतनी ही तरक्की कर रहा है। आज हम न तो चौथी बड़ी इकोनॉमी रहे हैं और न ही हमारा अंतरराष्ट्रीय संबंध ठीक से निभ रहा है। व्यक्ति को चमकाने के चक्कर में हमने देश की चमक को खुरच दिया है। आज देश से बड़ा व्यक्ति हो गया है। इसलिए व्यक्ति का विरोध करना देशविरोधी होना हो गया है। मुझे नहीं लगता कि कोई भी सच्चा देशभक्त, जिसे वाकई इस देश से प्यार है, किसी व्यक्ति का परमभक्त हो सकता है। वह भी उस व्यक्ति का जो अशिक्षित और विक्षिप्त बुद्धि का हो, जो सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए आमादा हो। शीर्ष पर बैठा व्यक्ति समाज का रिप्रजेंटेटर होता है। उसी से पता चलता है कि उसको वहाँ स्थापित करने वाला समाज कितना सभ्य है। और हर सभ्य समाज के लिए देश प्रथम होना चाहिए। लेकिन आज हम कर क्या रहे हैं?
अभी कुछ ही दिन पहले पटना वाले खान सर ने एक पॉडकास्ट में कहा है कि देश पहले रहना चाहिए, सत्ता बाद में। क्योंकि सत्ता तो बदलती रहती है। आज फलाँ गद्दी पर है, कल कोई और गद्दी पर बैठेगा। लेकिन देश रहेगा। बात बिल्कुल सही है। लेकिन समस्या यह है कि आज हम देशभक्त नहीं, पार्टी भक्त हो गए हैं। हर किसी के हाथ में किसी न किसी पार्टी का झंडा है, गले में चोगा है। जिंदाबाद-मुर्दाबाद के चक्कर में हम जिंदा इंसान को मुर्दा बना रहे हैं। मर-कट रहे हैं आपस में। यह तो देशभक्ति नहीं है। और ना ही आज अंग्रेजों को गाली देना, राष्ट्रवादी साहित्य के उद्धरणों को पेश करना ही देशभक्ति या राष्ट्रप्रेम है। अब हम गुलामी के दौड़ से बहुत आगे निकल आए हैं। इसलिए हमें आज देखना चाहिए कि वे कौन दीमक हैं, जो इस देश को खोखला कर रहे हैं। उसके खिलाफ आवाज बुलंद करना देशभक्ति है। शोषण, दमन, लूट-खसोट और भ्रष्टाचार का विरोध करना देशभक्ति है। अन्याय के विरुद्ध तनकर खड़ा होना, गरीबी, बेरोजगारी पर बात करना देशभक्ति है। सबको जीने, खाने-पहनने का समान अवसर मिले, इसके लिए लिखना-बोलना सच्ची देशभक्ति है। 'राही' में सुभद्रा कुमारी चौहान लिखती हैं, "हम सभी परमात्मा की संतान हैं। एक ही देश के निवासी हैं। कम-से-कम हम सबको खाने-पहिनने का समान अधिकार है ही? फिर यह क्या है बात है कि कुछ लोग तो बहुत आराम से रहते हैं और कुछ लोग पेट के अन्न के लिए चोरी करते हैं।" इसी तरह का विचार हमें
सच्चा देशभक्त साबित कर सकता है। हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद और भारत-पाकिस्तान करना देशभक्ति नहीं है। यह नासमझी, मूढ़ता, स्वार्थपरता और पागलपन का परिचय है। यदि ऐसा कोई व्यक्ति आपके साथ है तो आपको बधाई, आप जॉम्बीज के साथ हैं।
सभी लोग आर्थिक रूप से बराबर हो जाए, यह शायद संभव न हो, लेकिन इतना जरूर हो सकता है कि सब सम्मान के साथ कमा-खा सकें। मनपसंद की चीजें ओढ़-पहन सकें। तीर्थ-पर्यटन कर सकें। लेकिन सारी मसक्कत और जोर-आजमाइश इसी बात की है कि कैसे एक वर्ग को दबाकर आगे बढ़ा जाए, उसको अपने नियंत्रण में रखा जाए। यह नियंत्रण की मंत्रणा शोषण और विषमता का बहुत बड़ा कारण है। यही मंत्रणा व्यक्ति के भीतर श्रेष्ठता का विकार पैदा करता है। और यही श्रेष्ठता अपने को श्रेष्ठ बनाए रखने के लिए दूसरे को निकृष्ट साबित करता है। पहले इसके लिए धर्म का सहारा लिया जाता था। अब धर्म के साथ-साथ राजनीति का भी इस्तेमाल होने लगा है। धर्म और राजनीति की दोधारी कैंची से अन्य लोगों के किस्मत की लकीरें कुतरी जा रही है। धर्म को मानने वाले भी शायद धर्म के मायने भूल गए हैं। 'सबसे ऊपर मानव धर्म है, उसके ऊपर कुछ नहीं', 'मानुस प्रेम भए बैकुंठी' या 'परहित सरिस धर्म नहीं भाई' आदि सब बेकार की बातें हो गई हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान ने भी ऐसी ही ऊलजलूल बातें की हैं। वे लिखती हैं, "मानवीयता से बढ़कर कौन-सा धर्म है? पतित मानवता को जीवनदान देने की अपेक्षा भी कोई महत्तर पुण्य है?" आज सुभद्रा जी होतीं तो मैं उन्हें लिखता, "मानवीयता से बढ़कर भी कई धर्म हैं। जैसे समाज को बांटना, उसे आपस में लड़वाना, दूसरों का हक मार लेना, उसे पतित बनाए रखने का षड्यंत्र करना, दुम हिलाना, चमचागिरी करना, बोलनेवालों का गला दबाना आदि-आदि।" मैं उन्हें दर्जनों धर्म गिनाकर उनका दिमाग चकरा देता। या फिर वे खुद ही आज की दशा देखकर चक्कर खाकर गिर पड़तीं।
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