मैं जिंदा हूँ : रमेश ठाकुर
“ई के हई?”
“अरे! ई त अपना मिडिल इसकूल के हेड माहटर साहब हैं! रामप्रसाद माहटर साहब।”
“त ई मुहल्ले में काहे आए हैं?”
“होगा कउनों काम...!”
फूलवती पूछ रही है और रामप्यारी उसे सब बता रही है। फूलवती मुहल्ले में नई-नई आई है। पिछले साल ही रजबा उसे ब्याह कर लाया है। इसीलिए अभी ज्यादा लोगों को वह नहीं पहचानती है। बड़े लोग जब गरीबों की बस्ती में घुस आते हैं तो वहाँ के लोगों में संदेह पैदा हो जाता है। भय और जिज्ञासा का द्वंद्व उसके मन में चलने लगता है। किसी छोटभइका से उसके पड़ोसियों के सामने यदि कोई बड़ा आदमी बात कर लें तो मजाल है कि उसके समाज का कोई आदमी उसके साथ तू-तू, मैं-मैं करे! अपने समाज में उसका दबदबा बढ़ जाता है। जीतन मुखिया को कौन नहीं जानता! मलाह समाज में ही नहीं, पड़ोस में जितने भी छोटी जाति के लोग हैं, उसमें उसका दबदबा है। अनिल मिश्र का खास है इसलिए। दिनभर उसी के घर पड़ा रहता है। पशु की देखभाल करना, नाद में चारा डालना, खेत-खलिहान का चक्कर लगाना, सारा काम वही करता है। आप जानते हैं अनिल मिश्र कौन है? जिला न्यायालय का नामी वकील। पूरे मुहल्ले का मुकदमा वही लड़ता है। सबका कानूनी सलाहकार और मददगार वही है। वही सबको लड़वाता है और वही पैसे लेकर सुलह भी करवाता है। इसलिए मुहल्ले भर के लोग जीतन से जबान नहीं लड़ाते। उसके बच्चे और भी अगिया बैताल हैं! किसी को भी पीट देते हैं। किसी को भी घर चढ़कर गलिया आते हैं। इसलिए फूलवती को मास्टर साहब का मुहल्ले में आना शेर का बस्ती में घुस आने जैसा लगा। किन्तु रामप्यारी तो जैसे मुहल्ले भर की नानी हो! सबको जानती, पहचानती है। स्कूल से लौटने के बाद मजाल है कि वह घर पर टिककर रहे! दिनभर इधर-उधर घूमती रहती है। कभी इसके घर तो कभी उसके घर पक्षी की तरह फुदकती रहती है। मिडिल स्कूल में ही वह सात क्लास में पढ़ती है। इसलिए मास्टर साहब को देखते ही उसने पहचान लिया।
“अरी रामप्यारी! तू यहाँ?” मास्टर साहब ने रामप्यारी को वहाँ देखकर आश्चर्य से पूछा।
“जी माहटर जी! हमर घर एही मुहल्ला में है। ऊ... ऊ... भीत वाला घर हमरे है। चलिए न माहटर जी हमरा घरे। चाय पानी पी लीजिएगा।” रामप्यारी ने अपने घर की ओर इशारा करते हुए मास्टर साहब से घर चलने का अनुरोध किया।
“नहीं रामप्यारी! अभी बहुत काम है। सरकारी ज़िम्मेदारी है। बड़ा बोझ है कंधे पर। इसके चक्कर में पढ़ाना लिखाना सब चौपट हो गया है। पिछले कुछ दिनों से स्कूल भी कहाँ जा रहा हूँ! इसी काम में उलझा हुआ हूँ। फुर्सत नहीं है प्यारी! सरकार का वश चले तो वह मास्टर से ही झाड़ू, पोछा, बर्तन सब कराए! मास्टर नहीं, जैसे सरकार का बंधुआ मजदूर हो गया! वैसे हम नौकर ही तो हैं उसके! जो हुक्म होगा वह तो करना ही पड़ेगा! कोई भी सरकारी काम हो, शिक्षकों को लगा दो उसमें! हम पढ़ाते कम हैं, इसी तरह का आलतू-फालतू काम ज्यादा करते हैं और सपना देखते हैं विश्वगुरु बनने का। ऐसे बनेगा तुम्हारा भविष्य? ऐसे बनेंगे हम विश्वगुरु?”
मास्टर साहब ने बड़ा गंभीर सवाल कर दिया रामप्यारी से। उसे पता भी नहीं है कि विश्वगुरु का मतलब क्या होता है। वह पूछती है, “माहटर साहब, ई विषगुरु का होता है?”
“हा हा हा....!” मास्टर साहब ने ज़ोर का ठहाका लगाया और कहा, “अरी पगली! विषगुरु नहीं, विश्वगुरु! तुम तो नाक कटवा दोगी मेरी। बोलो विश्वगुरु!”
मास्टर साहब ने रामप्यारी को विश्वगुरु का उच्चारण ठीक करने को कहा। रामप्यारी ने फिर से ‘विषगुरु’ ही कहा। मास्टर साहब ने माथा पीट लिया। “तू नहीं सुधरेगी। स्कूल आ तब तुम्हें सिखाता हूँ।”
इतना कहकर वे फिर हँसे। रामप्यारी भी ‘सिखाता हूँ’ का मतलब समझ गई। हँसती हुई बोली, “ठीक है माहटर जी! आप इसकूले में सीखा दीजिएगा। अभी घर चल के एक गिलास पानी त पी लीजिए!”
“इस बार नहीं प्यारी। फिर कभी। अगली बार आऊँगा तो पक्का तुम्हारे घर चलूँगा।” मास्टर साहब ने अपनी असमर्थता व्यक्त की। रामप्यारी ने भी आगे कुछ नहीं कहा।
मास्टर साहब अक्सर किसी न किसी गाँव में दिख जाते हैं। सरकारी काम के सिलसिले में बराबर गाँव में आते-जाते रहते हैं। बहुत सहृदय और ईमानदार शिक्षक हैं। बाबा साहब आंबेडकर और महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलने वाले। उनके ऑफिस में केवल इन्हीं दोनों महापुरुषों की तस्वीर लगी है। बड़े संवेदनशील अध्यापक हैं। किसी से भेदभाव नहीं करते हैं। सबके प्रति समर्पित रहते हैं। दो ही काम उन्हें प्रिय हैं- पढ़ाना और समाज की सेवा करना। लोगों में उनका बड़ा आदर है। उनकी नजर में कोई बड़ा-छोटा है तो सिर्फ अपने विचारों से, रहन-सहन से। गंदगी से उन्हें नफरत है। उनका कहना है कि चाहे फटे कपड़े पहनो मगर साफ सुथरा पहनो। परंतु उनका यही समाज व्यवहार उनके शिक्षण का सबसे बड़ा शत्रु बन गया। गाँव में किसी से बात करनी होती तो उन्हें ही भेजा जाता है। परिणाम यह हुआ कि वे स्कूल में कम बाहर के कामों में अधिक उलझे रहते हैं। इससे वे बड़े दुःखी हैं। उनका पढ़ना-पढ़ाना छूट रहा है। गाँव में घूमते हुए कोई बच्चा इधर-उधर खेलता हुआ दिख जाता तो उन्हें बड़ा कोफ्त होता। कहते, “इसे तो अभी स्कूल में होना चाहिए था।” फिर यह सोचकर रह जाते कि कायदे से तो उन्हें भी स्कूल में ही होना चाहिए था! सबकी अपनी-अपनी परेशानियाँ हैं। न चाहते हुए भी जीवन में इच्छा के विरुद्ध बहुत कुछ करना पड़ता है। मास्टर साहब वही कर रहे हैं।
मास्टर साहब कंधे पर खादी का झोला और हाथ में छाता लिए आज फिर सरकारी काम से ही ब्रह्मपुर टोल आए हैं। रिटायर होने को हैं पर उनकी उम्र का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। गाँव भर का अनुभव उनके पास है। वर्षों से एक ही स्कूल में पढ़ा रहे हैं इसलिए। कोई बच्चा शरारत करता तो वे कहते, “कमबख्त! तू मुझे सिखाएगा? तेरे बाप को भी मैंने ही पढ़ाया है! तेरा बाप भी ऐसा ही नालायक था। तू जरूर उसका नाम रौशन करेगा!” और फिर चट-चट, पट-पट, तरातर-तरातर चार-पाँच छड़ी पीठ पर जड़ देते। बच्चा गइंचा मछली की तरह पीठ सीधी करके वहाँ से भाग जाता। वे बच्चों को बहुत कम मारते हैं। जब बहुत ज्यादा परेशान हो जाते हैं तभी हाथ उठाते हैं। उनका मानना है कि ज्यादा लाड़-प्यार से बच्चा बिगड़ जाता है। इसलिए भय दिखाना जरूरी है। “भय बिनु होय न प्रीति” उनका मूलमंत्र है।
सफ़ेद धोती, उसके भीतर सफ़ेद और नीली रंग की डोरिया हाफ पैंट स्पष्ट दिखाई दे रही है। सफ़ेद कुर्ता और उसके ऊपर खादी की काली सदरी। सिर पर सफ़ेद गांधी टोपी। एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में दो-चार काले, पीले, लाल रंग का मोटा-मोटा रजिस्टर। पाँव में चमड़े का काला और चमकीला जूता और कंधे पर खादी का झोला लटकाए मोहल्ले में आए हैं। मानो कोई स्वतंत्रता सेनानी हो! लाल बहादुर शास्त्री लग रहे हैं! उन्हें देखते ही रामप्यारी दौड़ी आई थी। “का काम है माहटर जी, जो आपके पास तनको समय नहीं है?” रामप्यारी ने पूछा।
“अरी रमपियरिया! तुम्हें मालूम है न कि चार-पाँच महीने पहले गाँव में बाढ़ आई थी?”
“जी माहटर साहब। याद है। ओही बाढ़ में त हमरा पड़ोसी के बेटा डूब के मर गिया था। अउर हमरा नानी इहाँ के त गाँव में पानी घुस गिया। बहूते के त गाय-भंइस पानी में बह गिया। खूबे भयनकर बाढ़ था माहटर साहब!” कहते-कहते रामप्यारी उदास हो गई।
“बोलो, बहुत भयंकर बाढ़ थी” मास्टर साहब ने फिर रामप्यारी के वाक्य को दुरुस्त करना चाहा। रामप्यारी ने सिर्फ इतना कहा, “हाँ उहे!” उसने फिर मास्टर साहब से पूछा, “माहटर साहब, हर साल एतना पानी कहाँ से आता है? हमरा मोहल्ला के त सभे आदमी के खेत का फसल उसमें बह गिया। सब बहूते परेसान हैं। केकरो खेत में धान नहीं है। सब डूब गिया। ई साल हम कथी खाएँगे इहे नहीं समझ में आ रहा है। कहाँ से आता है एतना पानी माहटर साहब?”
मास्टर साहब इस सवाल से सोच में पड़ गए। “नेपाल से आता है प्यारी!” सिर्फ इतना ही कहा।
“त नेपाल को आप लोग रोकते काहे नहीं हैं माहटर साहब?” यह सुनकर मास्टर साहब फिर अचंभित हुए। रामप्यारी का सवाल उन्हें परेशान करने लगा। उनका सिर चकरा गया। उन्होंने कहा, “अरी पगली! मेरे कहने से होगा? यह सरकार का काम है। वह कहेगी तभी कुछ होगा।”
“त आप सरकार से कहते काहे नहीं हैं माहटर साहब?”
“मेरा कहना कहाँ सुनेगी सरकार पियरिया!”
“काहे नहीं सुनेगा माहटर साहब? आप भी त ओकरे काम रह रहे हैं! ऊ कहता है त आप सुनते हैं, आप कहेंगे त ऊ काहे नहीं सुनेगा?”
“क्यों नहीं सुनेगी, ऐसा बोलो पगली!”
“हाँ हाँ उहे! क्यों नहीं सुनेगी!”
“अरे! सब बड़े लोग हैं। उन तक हमारी बात कहाँ पहुंचेगी रामा!”
“त आपो से से बड़का-बड़का लोग हैं? हमको त लगता है कि आप ही सबसे बड़का आदमी हैं। हेड माहटर हैं आप तो!”
“अरी पगली! मैं स्कूल का हेड मास्टर हूँ। बिहार का नहीं।” इतना कहकर वे हँसे जरूर पर रामप्यारी का सवाल उनके दिमाग को मथने लगा। गौर से रामप्यारी को देख रहे हैं। उन्होंने जानबूझकर आगे कुछ नहीं कहा। नहीं तो वह और सवाल करती। यदि वे कह देते कि “आपदा ही सरकार की संपदा है” तो यह बात मासूम मस्तिष्क को और समझ में नहीं आती। चुप रहना ही उन्होंने उचित समझा। थोड़ी देर बाद बोले, “जो बाढ़ आई थी, जिसमें किसानों के फसल बर्बाद हो गए थे, उसी के लिए सरकार ने राहत सामग्री भेजी है। उसे गरीबों और बाढ़ पीड़ितों में बाँटना है। उसी की गणना करने के लिए सरकार ने मुझे यह काम सौंपा है। यह पता करना है कि किस परिवार में कितने लोग हैं। कौन विवाहित है और कौन अविवाहित। इसीलिए आया हूँ। तू बता, कहाँ बैठा जाए और सबका नाम लिखा जाए?”
“ई राहत सामगरी का होता है माहटर जी?” रामप्यारी ने फिर सवाल किया। मास्टर साहब झेंप गए। इस बार उन्होंने रामप्यारी को साफ-साफ समझा दिया कि अब वह आगे कोई सवाल नहीं करेगी तभी इसका उत्तर बताएँगे। रामप्यारी ने बात मान ली। मास्टर साहब बोले, “जिन-जिन लोगों की फसल बर्बाद हो गई है और जिनके पास खाने को कुछ नहीं बचा है, सरकार उसे खाने-पीने के लिए चावल और पैसा देगी। इसे ही राहत सामग्री कहते हैं। बस्स! अब हो गया! अब तुम कोई सवाल नहीं करोगी! समझ गई?”
“अच्छा! त पहिले फसल बरबाद करो, फिर भीख दो और बदले में भोंट माँगो! सरकार त बहूते चलाकी करता है माहटर जी! ऊ चाहे त बाढ़ को रोक सकता है। हर साल एतना लोग मरते हैं, कइयों के त घर बह जाते हैं। गाय, भंइस, बकरी, खंसी सब बह जाते हैं। ई चावल और पइसा से केकरो बेटा-बेटी आपस आएगा माहटर जी? बताइए! अउर ई नेपाल कोरफुट्टा के त कोढ़ी फुट जाए माहटर जी!”
इतना कहकर रामप्यारी सकपका गई। उसने पहली बार मास्टर साहब के सामने गाली दी है। वह डर गई कि मास्टर साहब उसे डाँटेंगे। सिमटकर रह गई।
मास्टर साहब ने इस बार उसकी अशुद्धि को शुद्ध करने का कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने अपने हाथ का रजिस्टर रामप्यारी के हाथ में पकड़ा दिया और उसके कंधे पर हाथ रखकर उसके मुख की ओर देखते हुए कहा, “ठीक कहती हो प्यारी! चलो अब कहीं बैठकर सब का नाम लिखते हैं।” रामप्यारी बड़ी खुश हुई। “जी माहटर साहब! अच्छा माहटर साहब, रजिस्टर में हमरा भी नाम लिखाएगा? ई समान हमको भी मिलेगा का?” मास्टर साहब ने रामप्यारी की तरफ देखा। रामप्यारी ने माथा पीट लिया, “ओहो! हम त भुलिए गए थे कि हमको सवाल नहीं पूछना है। गलती हो गिया माहटर साहब!” उसने हाथ जोड़ ली।
“हाँ! नाम तो तुम्हारा भी लिखाएगा। पर सामान शायद सिर्फ वयस्क को ही मिलेगा।”
‘ई वयस्क किसको कहते हैं माहटर जी?”
“जिसकी शादी हो जाती है उसे वयस्क कहते हैं।” मास्टर साहब मान चुके थे कि रामप्यारी रुकने वाली नहीं है। इसलिए रामप्यारी की दाढ़ी की ठुढी हिलाते हुए कहा। वोट के अधिकार वाली बात उन्होंने नहीं कहेगी।
“धत् तेरी की! फिर त हमरा नहीं मिलेगा माहटर जी!” इतना कहकर वह शरमा गई। उसके बाद उसके सवाल भी खत्म हो गए। तब तक मुहल्ले के कई लोग वहाँ इकट्ठा हो गए। मर्द काम पर चले गए हैं। सिर्फ महिलाएँ और छोटे बच्चे हैं। तेतरी ने आवाज दी, “माट साहब, हियाँ बैठिए, हियाँ!” मास्टर साहब ने पलटकर देखा कि वहाँ एक कोने पर राख की ढ़ेर है जिस पर बच्चों के मल पुआल में लपेटे रखे हुए हैं। उससे बदबू आ रही है। वे यहाँ कैसे बैठ सकते हैं! इसी से तो उन्हें नफरत है। वे कुछ बोले नहीं पर नाक सिकोड़कर रह गए। तभी कैलसिया बोली, “माहटर साहब, आप हमरा यहाँ चलिए। उहाँ थोड़ा चिक्कन है। गंदा-उंदा नहीं है उहाँ। उहाँ आपको कउनो दिक्कत नहीं होगा।”
“हाँ माहटर जी! चाची के दुअरा बहूते साफ रहता है! उंहे चलिए।” रामप्यारी ने भी अपनी सहमति दी। सब कैलसिया के दरबाजे पर गए। कैलसिया ने झटपट अंदर से चटाई लाकर नीम के पेड़ के नीचे बिछा दी। पर जाजिम लाकर नहीं दी। उसका पोता रोज रात को उस पर पेशाब करता है। उसके सभी जाजिम गंधा रहे है। लेकिन दो-तीन नई चटाई उसके घर में हमेशा लपेटे रहती है। रामप्यारी भागती हुई अपने घर गई और पेटी खोलकर उसमें से नया जाजिम निकालकर ले आई और चटाई पर बिछा दी। कुछ ही दिन पहले उसने नया जाजिम खरीदा है। अभी तक उसने उसका इस्तेमाल भी नहीं किया है। अपने लिए अभी से एक-एक समान जोड़ रही है। लड़कियों को बचपन से ही बड़े होने की ज़िम्मेदारी का अहसास हो जाता है। रामप्यारी भी समझने लगी है कि एक दिन उसका भी ब्याह होगा और उसे मायका छोड़कर ससुराल जाना पड़ेगा। अपने लिए वह एक-एक पैसा जोड़ती है और थोड़ा-बहुत समान सहेज कर रखती है। गरीबों के पास इतने पैसे नहीं होते कि एकाएक वह बहुत सारा सामान खरीद सके। रामप्यारी को अपना हाल मालूम है। इसलिए स्वयं कुछ न कुछ जोड़ती रहती है।
मास्टर साहब नया जाजिम देखकर बड़े खुश हुए। उन्होंने रामप्यारी की ओर देखा। उसकी नजरें झुक गईं। मास्टर साहब ने रामप्यारी के हाथ का जैसे चाय-पानी सब एक साथ पी लिया हो! उनकी आत्मा तृप्त हो गई। गहरी साँस लेते हुए उन्होंने जाजिम पर हाथ फेरा और पालथी मारकर बैठ गए। बैठने के बाद काफी देर तक वे जाजिम पर हथेली फेरते रहे। उसके बाद बोले, “रामा, तुम भी बैठो मेरे सामने। और ये रजिस्टर यहाँ बगल में रख दो।” रामप्यारी मास्टर साहब के सामने बैठ गई। एक तरफ मास्टर साहब, दूसरी तरफ रामा और बीच में मोटा रजिस्टर। मास्टर साहब ने लाल रजिस्टर निकाला और सब का नाम और उम्र लिखना शुरू किया। बगल में नीम के पेड़ में बँधी गाय कान खड़ी करके सुनने लगी। बकरी भी मिमिया उठी। मुहल्ले के एक-दो आवारा कुत्ते भौंकते हुए वहाँ इकट्ठा हो गए और जमीन को खुरचकर मास्टर साहब की ओर मुँह करके बैठ गए। भीड़ देखकर आठ-दस कौए भी पेड़ पर जमा होकर कांव-कांव करने लगे। उसे लगा कि फिर कोई बकरा हलाल हुआ है। बकरे को काटने के बाद उसी नीम के पेड़ पर लटकाकर उसकी खाल उतारी जाती है। कौए इस डाल से उस डाल पर कांव-कांव करते हुए कुदकने-फुदकने लगे। एक लड़के के तो माथे पर ही हग दिया। मास्टर साहब डर गए कि कहीं उनकी सदरी भी काली से सफ़ेद न हो जाए! पर उन्होंने कौए से ध्यान हटाकर लिखना प्रारंभ किया। सबसे पहले उन्होंने रामप्यारी से ही पूछा-
“बता रामा, तुम्हारे बाबा का क्या नाम है?”
“रामपीड़ित मुखिया माहटर जी।”
“उम्र?”
“साठ बरिस सर जी।”
“बरिस नहीं बेटा! वर्ष बोलो।”
“हाँ! उहे माहटर साहब!”
मास्टर जी हँसे। उन्होंने मान लिया कि रामप्यारी को उच्चारण समझाना व्यर्थ है। पूछना जारी रखा।
“तुम्हारी दादी का क्या नाम है रामू बेटा?”
“दादी त मर गई है माहटर साहब!”
“ओह! कोई बात नहीं। अपने पापा का नाम बताओ।”
“राम लखन मुखिया सर जी।”
“उम्र?”
“चालीस साल।”
“चाचा का नाम?”
“हमर चाचा नहीं है सर जी! खाली पापा है।”
“ठीक है! तुम कितने भाई बहन हो?”
“सर जी तीन। बड़का भइया का नाम भरत है और छोटका का सतरोहन। आ... आ... हमर नाम त आप जनबे करते हैं!” रामप्यारी मास्टर साहब की ओर देखकर खिलखिला उठी। मास्टर साहब ने बिना कुछ कहे रजिस्टर में सतरोहन को शत्रुध्न लिख लिया। फिर पूछा-
“अब दोनों भाई की उम्र बताओ रामा।”
‘बड़का भइया के बीस और छोटका के सतरह साल।”
मास्टर जी ने फिर सतरह को सत्रह किया और पूछा-
“अच्छा! अब तुम अपनी उम्र बताओ।”
रामप्यारी चुप हो गई। वहाँ खड़ी महिलाओं की ओर देखकर शरमा गई। बीच से एक महिला ने आगे बढ़कर कहा, “माट साहब! पियरिया त चौदह साल के हो गिया है!”
मास्टर साहब ने बिना रामप्यारी से कुछ पूछे उसकी उम्र चौदह साल लिख दी। पाँच साल की हो गई थी तब उसने पढ़ना-लिखना शुरू किया था। सात साल की हो गई तब उसके पिता ने पहली कक्षा में उसका दाखिला करा दिया।
मास्टर साहब ने आगे पूछा, “अब बताओ, किस-किस भाई की शादी हो गई है? ध्यान रखना, जिसकी शादी हो गई है, केवल उसे ही मिलेगा राशन और पैसा। कुँवारे को नहीं!” सुनकर रामप्यारी उदास हो गई। बोली, “माहटर साहब! अभी त केकरो बियाह नहीं हुआ है!” मास्टर साहब ने एक बार रामप्यारी की ओर देखा और रजिस्टर में नोट कर लिया। इसी तरह उन्होंने पूरे मुहल्ले का नाम रजिस्टर में उतार लिया और पीठ सीधी करते हुए रामप्यारी से कहा, “बेटा रामपरि! एक ग्लास पानी पिला दे अब। बहुत तेज प्यास लगी है। तुम्हारे हाथ की चाय फिर कभी पी लूँगा। नहीं तो कहोगी कि मास्टर साहब आए और बिना पानी पिए चले गए!” उन्होंने रामप्यारी की ओर देखकर मुस्कुरा दिया।
इतना सुनते ही रामप्यारी का चेहरा खिल उठा। वह गदगद हो गई। लोटा लेकर भागती हुई चापाकल के पास गई और पहले उसको खूब चलाया ताकि ठंडा पानी निकले। एक हाथ में लोटा और एक में गिलास भरकर ले आई। मास्टर साहब ने पानी पिया और रामप्यारी को ढेर सारा आशीर्वाद दिया। वे चलने को तैयार हुए। महिलाएँ मक्खियों की तरह भनभनाकर एक साथ उठ खड़ी हुईं। कुत्ते भी उठकर भाग खड़े हुए और दूर जाकर पलटकर मास्टर साहब को देखने लगे। बकरी एक बार फिर मिमिया उठी और कौए भी सब उड़ गए। “अब चलता हूँ रामप्यारी!” यह कहते हुए मास्टर साहब चलने को तैयार हुए। उनके जाते-जाते रामप्यारी ने एक सवाल फिर किया, “ई सामान कब मिलेगा माहटर जी?”
“शायद अगले महीने में मिल जाएगा!” इतना कहकर मास्टर साहब वहाँ से चले गए। रामप्यारी के साथ-साथ सभी महिलाएँ उन्हें जाते हुए बड़े ध्यान से देख रही हैं। वे चले गए। अब दिखाई नहीं दे रहे हैं।
अगले महीने गाँव के अंचल में लोगों का हुजूम जमा हो गया। रामप्यारी अपने बाबा और पिता के साथ ब्लॉक जा पहुँची। “अभी शायद बंसवरिया टोली वाले को मिल रहा है। इसके बाद हमारे मुहल्ले का लंबर आएगा” रामापीड़ित ने कहा। “लंबर नहीं बाबा, नंबर बोलते हैं!” इस बार रामप्यारी ने अपने बाबा के अशुद्ध उच्चारण को शुद्ध किया। रामापीड़ित ने भी कहा, “हाँ हाँ उहे!” यह सुनकर रामप्यारी अपना माथा खुजुआने लगी। तभी अंचल की छत पर लगे लाउडस्पीकर से आवाज आई- “ब्रह्मपुर मोहल्ले वाले सब तैयार हो जाएँ।” सुनते ही सभी लोग अपनी-अपनी बोरी का मुँह सीधा करने लगे। वितरण आरंभ हुआ। सबसे पहले सिंह टोली वाले को मिलना शुरू हुआ। रामप्यारी बड़े ध्यान से लाउडस्पीकर की आवाज सुन रही है...
“विनय सिंह, उम्र पचास साल। पचास किलो चावल और पाँच सौ रुपया।”
“देवेन्द्र सिंह, पिता विनय सिंह, उम्र बीस साल, पचास किलो चावल और पाँच सौ रुपया।”
“गोविंद सिंह, पिता विनय सिंह, उम्र पंद्रह साल, पचास किलो चावल और पाँच सौ रुपया।”
“उमेश सिंह, पिता विनय सिंह, उम्र दस साल, पचास किलो चावल और पाँच सौ रुपया।”
लाउडस्पीकर पर आवाज सुनाई दी- “अब ब्राह्मण टोली वाले तैयार रहें।”
“लालबाबू मिश्र, उम्र पचास साल, पचास किलो चावल और पाँच सौ रुपया।”
“राजू मिश्र, पिता लालबाबू मिश्र, उम्र पच्चीस वर्ष, पचास किलो चावल और पाँच सौ रुपया।”
“मदन मिश्र, पिता लालबाबू मिश्र, उम्र पंद्रह साल, पचास किलो चावल और पाँच सौ रुपया।”
सबको पचास किलो चावल और पाँच-पाँच सौ रुपया मिला। विवाहित-अविवाहित दोनों को। वयस्क-अवयस्क सभी को। रामप्यारी उँगली पर हिसाब लगा रही है कि सब मिलाकर उसको कितना पैसा और चावल मिलेगा। तभी लाउडस्पीकर से आवाज आई- “अब मलाहटोली वाले तैयार हो जाएँ।” रामप्यारी अपने बाबा और पिता के साथ आगे बढ़ गई। एक-एक को चावल और पैसा मिलना शुरू हुआ। लेकिन सब को चालीस किलो ही मिल रहा है। गरीब जनता विद्रोह भी नहीं कर सकती। जो मिल रहा है वही उसके लिए काफी है। भूखे को रोटी चाहिए, वह ताजी-बासी की जाँच पड़ताल नहीं करता। प्यासे को पानी चाहिए, वह कुएं और चापाकल में फर्क नहीं करता। वैसे ही गाँव के गरीब किसान-मजदूर हैं। विद्रोह किया तो चालीस किलो राशन भी नहीं मिलेगा। उसे राहत सामग्री चाहिए। कितना मिल रहा है, किसको मिल रहा है, इसकी उसे सुध कहाँ! रामप्यारी बोलना चाहती है, पर उसके पिता उसे चुप करा देते हैं, “की कर लेगी तू बोल के? इहाँ के अफसर, दफदार, जमदार सब त ओकरे आदमी है। जे मिल रहा है उहो नहीं मिलेगा। तू चुप रह अभी। एकदम मुँह बंद रख।” रामप्यारी पिता की बात मानकर चुप हो गई है। अचानक रामपीड़ित को सुनाई दिया- “राम लखन मुखिया जल्दी आए।” वह बेटे के साथ झटपट अंदर गया और चावल लेकर वहीं कोने में खड़ा हो गया। उसे लगा कि बेटे के बाद अब उसी का नाम आएगा। बाहर गया तो भीड़ में दोबारा अंदर आने के लिए फिर से धक्का-मुक्की करनी पड़ेगी। वह कमरे के अंदर ही हाथ में बोरी लटकाए भीत से सटकर खड़ा हो गया। लेकिन राम लखन के बाद न रामापीड़ित का नाम आया न उसके दोनों पोते और पोती रामप्यारी का। किसी का नाम उसे सुनाई नहीं दिया। उसके पड़ोसी आ रहे हैं और चावल पैसा लेकर जा रहे हैं। चावल चालीस किलो ही, पर सबके चेहरे हरे-भरे। रामापीड़ित को दरवाजे के पास कोने में खड़ा देखकर चौकीदार ने डपटकर पूछा, “यहाँ क्या कर रहे हो? फूटो यहाँ से! बाहर जाकर अपनी बारी का इंतजार करो!” “हुजूर! हमर नाम त अभी अइबे नहीं किया है। खाली हमरा बेटा का नाम आया है। इसीलिए हम इहाँ खड़ा हूँ हुजूर! हमरा बेटा को समान मिले बहुते देर हो गिया, पर हमर नाम अभी नहीं लिया हुजूर!” रामपीड़ित ने दोनों हाथ जोड़कर चौकीदार से कहा।
“जाओ यहाँ से। बाहर जाकर बैठो। जब तुम्हारा नाम आएगा तो तुम्हें बुला लिया जाएगा। यहाँ भीड़ इकट्ठा मत करो।” चौकीदार ने फिर डाँटा। रामपीड़ित वहाँ से चार कदम पीछे हटकर खड़ा हो गया। वह आधा-एक घंटा तक वहीं खड़ा रहा, पर न उसका नाम आया और न उसके पोते-पोती का। लाउडस्पीकर से आवाज आई- “मुखिया टोली खत्म। अब महतो टोली वाले तैयार रहें।” रामापीड़ित परेशान हो गया। उसका बदन काँपने लगा। पाँव थरथराने लगे। वहीं भीत के सहारे वह बैठ गया। थोड़ी देर बाद उठा और काँपते हुए उसने चौकीदार से शिकायत की। चौकीदार उसे कमरे के अंदर बाबू साहब के पास ले गया। बाबू साहब ने वोटर लिस्ट खोलकर देखा तो उसमें रामापीड़ित का नाम था ही नहीं। बाबू साहब हैरान होकर बोले, “इसमें तो तुम्हारा नाम है ही नहीं। यह तो बता रहा है कि तुम्हें मरे हुआ चार साल हो गया है। जाओ तुम्हारा नाम इसमें नहीं है। हम तुमको राशन और पैसा नहीं दे सकते हैं।” रामपीड़ित वहीं ग़श खाकर बैठ गया। टेबल के सहारे खड़े होकर बोला, “हुजूर! हम आपको भूत दिखाई दे रहा हूँ? हम आपको जिंदा नहीं लग रहा हूँ हुजूर?”
“तुम वोटर लिस्ट के मुताबिक मर चुके हो रामपीड़ित। रोने-धोने से काम नहीं चलेगा। मेरे हाथ में नहीं है कि मैं तुम पर रहम करके राशन और पैसा दे दूँ। यहाँ तुम्हारे जैसे बहुत हैं। बवाल हो जाएगा। किसी को एक दाना नहीं मिलेगा। बवाल खड़ा करना नहीं चाहते हो तो यहाँ से चले जाओ।”
“ठीक है हुजूर! हम चला जाऊँगा। पर मेरे दोनों पोते और पोती का भी नाम नहीं आया है। ऊ सब तो है न लिस्ट में?” रामापीड़ित ने हाथ जोड़कर बाबू साहब से अपने पोते-पोती का नाम देखने को कहा।
“क्या नाम है उसका?” बाबू साहब ने पूछा।
“जी भरत, सतरोहन और रमपियरिया।”
“हाँ! तुम्हारे बड़े पोते भरत का नाम तो है इसमें।”
“त उसका नाम काहे नहीं आया? उसको भी नहीं मिलेगा का हुजूर?” बड़े कातर भाव से रामापीड़ित ने बाबू साहब से पूछा।
“उसको कैसे मिलेगा? वह तो अभी कुँवारा है। उसको नहीं मिलेगा। तुम जाओ यहाँ से।” बाबू साहब ने भारी आवाज में कहा।
“हुजूर! हमर बड़का पोता त बीस साल का हो गिया है। उसका नाम भोंटर लिस्ट में भी है। त उसको काहे नहीं मिलेगा हुजूर? आपने सिंह जी के दस बरिस के बेटे को पचास किलो चावल और पाँच सौ रुपया दिया। पंडित जी के पंडह साल के बेटा को दिया। ऊ दोनों त हमरा सतरोहना से भी छोटा है! आपने त हमरा बड़का पोता का भी नाम नहीं लिया। काहे हुजूर?” रामापीड़ित ने जैसे ही इतना कहा कि बाबू साहब भड़क गए।
“मैंने दिया है उसको? मेरे हाथ में है जो तुम पटर-पटर बोल रहे हो? गार्ड! भगाओ इसे यहाँ से! नहीं जाता है तो जड़ दो दो-चार लाठी इसकी पीठ पर! सारी अक्लमंदी निकाल दो इसकी! हाथ पकाराओ तो सीधा गला पकड़ लेते हैं ये लोग! भगाओ इसे यहाँ से!” बाबू साहेब आग बबूला हो गए। गार्ड आया और धक्के मारकर रामापीड़ित को कमरे से बाहर कर दिया। रामपीड़ित फफक पड़ा। रोता हुआ कमरे से बाहर आया। आते ही रामप्यारी को सीने से लगाकर जोर-जोर से रोने लगा। रामप्यारी ने बाबा के कंधे पर रखे गमछे से उसकी आँखें पोछी। राम लखन ने चावल की बोरी कंधे पर रखी। सब घर की तरफ चल पड़े। रामापीड़ित को दिन के उजाले में भी रास्ता धुँधला दिखाई पड़ रहा है। उसकी आँखों से आँसू का बहना बंद नहीं हो रहा है। लोगों की साइकिलों पर दो-दो, तीन-तीन बोरियाँ लदी देखकर उसका कलेजा फटा जा रहा है।
(2012 बीए अंतिम वर्ष के दौरान लिखी गई कहानी, जो अक्टूबर 2022 - मार्च 2023 में 'स्वनिम' पत्रिका में प्रकाशित हुई. पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें. धन्यवाद!!)
लेखक परिचय
डॉ. रमेश कुमार राज
SWA Member
जन्म: 10 फरवरी 1989, सीतामढ़ी जिला, बिहार
शिक्षा: 2012 में प्रथम श्रेणी से बी.ए. हिंदी ऑनर्स, राजधानी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
वर्ष 2014 में प्रथम श्रेणी से एम. ए. हिंदी, हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
2014-15 में ‘महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से ‘मुक्तिबोध का आत्म-संघर्ष: विशेष संदर्भ मुक्तिबोध के पत्र’ विषय पर प्रो. कृष्ण कुमार सिंह के शोध- निर्देशन में एम. फिल. हिंदी
फरवरी 2023 में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से ‘तुलसीदास के काव्य में आदर्श और यथार्थ का द्वंद्व’ विषय पर प्रो. गोपेश्वर सिंह और डॉ. बिमलेंदु तीर्थंकर के शोध-निर्देशन में पीएचडी.
जुलाई 2016 में 72 प्रतिशत अंकों के साथ JRF उत्तीर्ण
फरवरी 2020 – मई 2023 तक से दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर (Adhoc) के पद पर कार्य किया.
वर्ष 2016 से 2020 तक रामानुजन कॉलेज में अतिथि अध्यापक (NCWEB) के रूप में कार्य किया.
वर्ष 2023 से 2024 तक कालिंदी कॉलेज में अतिथि अध्यापक (NCWEB) के रूप में कार्य किया.
वर्ष 2023 से 2024 तक हंसराज कॉलेज में अतिथि अध्यापक के रूप में कार्य किया.
प्रकाशन: ‘जनसत्ता’ के ‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में ’पहनावे की पहचान’ (20 फरवरी 2012), ‘सच का ठौर’ (27 जुलाई 2012) ‘वर्चस्व का औजार’ (14 सितम्बर 2012), ‘खौफ की वर्दी’ (7 फरवरी 2013), ‘अँधेरी राह’ (31 जुलाई 2015) नाम से लेख प्रकाशित.
‘वाणी प्रकाशन’ से नवनीत आचार्य द्वारा सम्पादित ‘भक्ति के स्त्री-स्वर’ शीर्षक पुस्तक में ‘भक्त कवियों का स्त्री विषयक दृष्टिकोण’ नाम से एक अध्याय संकलित.
गोपेश्वर सिंह की आलोचनात्मक और सम्पादित पुस्तक ‘आलोचना के परिसर’ और ‘विजयदेव नारायण साही’ की भूमिका में आभारी के रूप में उपस्थित.
पुस्तक:
1. अलक्षित मुक्तिबोध (प्रभाकर प्रकाशन 2021)
2. आदिकालीन हिंदी साहित्य (reading rooms 2019)
3. हिंदी साहित्य का इतिहास: आदिकाल (हंस प्रकाशन 2025)
4. बाढ़ और बरगद का पेड़ (उपन्यास, कलमकार पब्लिशर्स, 2025)
5. आदिकाल एवं निर्गुण भक्तिकाव्य (शीघ्र प्रकाश्य)
कहानी: फिर कभी मिलेंगे (जानकी पुल वेब पोर्टल), मन नहीं लगता (जनकृति पत्रिका) मैं जिंदा हूँ (स्वनिम पत्रिका)
गीत लेखन: अवध में आए हैं अवधेश (https://www.youtube.com/watch?v=mXHH1nxqe1U)
स्क्रिप्ट लेखन: मुआवज़ा (लघु फिल्म) सरकारी नौकरी (लघु फिल्म) तथा अन्य पटकथा लेखन.
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और संपादित पुस्तकों में समसामयिक लेखन.
फिल्म: सरकारी नौकरी (लघु फिल्म, मुख्य भूमिका के रूप में YouTube पर प्रदर्शित.)
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