‘नयी कहानी’ की कालजयी रचना 'राजा निरबंसिया’
‘राजा निरबंसिया’- कमलेश्वर
प्रमुख पात्र: मैं, जगपती, चंदा, बचनसिंह, शकूरे, हंसराज पंजाबी, सुदर्शन दर्जी, जमुना सुनार, बंसी किरानेवाले, मदसूदन और मुंशीजी।
प्रमुख कथन:
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मेरे सामने मेरे ख्यालों का राजा था, राजा जगपती। तब जगपती से मेरी दोस्ती दांतकाटी दोस्ती थी।– मैं
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मैं मैट्रिक पास करके एक स्कूल नें नौकर हो गया और जगपती कस्बे के ही वकील के
यहाँ मुहर्रिर। - मैं
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बेटा जगपती बड़े लाड़-प्यार का पला है। जब से तुम्हारे ससुर नहीं रहे, तब से इसके छोटे-छोटे हठ पूरा करती हूँ। अब तुम ध्यान रखना। (जगपती की माँ चंदा
से)
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ये हवाई बंदूकें इन ठेल-पिलाई लाठियों का मुक़ाबला नहीं कर पाएँगी। - जगपती
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कस्बे का अस्पताल था। कंपाउंडर ही मरीज की देखभाल रखते। बड़ा डॉक्टर तो नाम के
लिए था या कस्बे के बड़े आदमियों के लिए। छोटे आदमियों के लिए तो कंपोटर साहेब ही ईश्वर
के अवतार थे,
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अस्पताल में या तो फ़ौजदारी के शहीद आते या गिर-गिराकर हाथ-पैर तोड़ लेने वाले
एकाध लोग।
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दिल छोटा मत करना, जाँघ का घाव
तो दस रोज में भर जाएगा, कूल्हे का घाव
कुछ दिन जरूर लेगा। अच्छी से अच्छी दवाइयाँ दूँगा। दवाइयाँ तो ऐसी है कि मुर्दों को
चंगा कर दें। (बचनसिंह चंदा से)
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देखो चंदा, चादर के बराबर ही पैर फैलाए जा सकते हैं। हमारी
औकात इन दवाइयों की नहीं।– जगपती
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औकात आदमी की देखी जाती है कि पैसे की, तुम तो..... चंदा
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कर्ज कोढ़ का रोग होता है, एक बार लगने
से तन तो गलता ही है, मन भी रोगी हो जाता है।– जगपती
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ये दवाइयाँ किसी की मेहरबानी नहीं हैं, मैंने हाथ का कड़ा बेचने को दिया था, उसी में आई है।– चंदा
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तब उसके सामने आदमी के अधिकार की लक्ष्मण-रेखाएँ धुएँ की लकीर की तरह कांपकर
मिटने लगीं और मन में छुपे संदेह के राक्षस बाना बदल कर योगी के रूप में घूमने लगे।
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राजा निरबंसिया अस्पताल से लौट आए, कुलमा भी आई है।– चाची
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तुम्हारे कभी कुछ न होगा। न तेल न..... जगपती
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उसे लगता, जैसे कड़े माँगकर वह चंदा से पत्नीत्व का पद भी
छीन लेगा। मातृत्व तो भगवान ने छीन ही लिया।
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एक स्त्री से यदि पत्नीत्व और मातृत्व छीन लिया गया तो उसके जीवन की सार्थकता
ही क्या?
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आड़े वक्त काम आने वाला आदमी है, लेकिन उससे
ज्यादा फायदा उठा सकना जितना आसान है उतना.... मेरा मतलब है कि जिससे कुछ लिया जाएगा, उसे दिया भी जाएगा।– जगपती
·
वह उस घर में पैदा नहीं हुआ, जहाँ सिर्फ
जबान हिलाकर शासन करने वाले होते हैं। वह उस घर में भी पैदा नहीं हुआ, जहाँ सिर्फ माँगकर जीने वाले होते हैं। वह उस घर का है जो सिर्फ काम करना जानता
है, काम ही जिसकी आस है।
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कोई एक राग दुखती तो वह सहलाता भी, जब सभी नसें चटखती हों तो कहाँ-कहाँ राहत का अकेला हाथ सहलाए।
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आज छः साल हो गए शादी को, न बाल न बच्चा, न जाने किसका पाप है उसके पेट में।– चाची
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यह सब मुझे क्या दिखा रही है? बेशर्म! बेगैरत!
उस वक्त नहीं सोचा था जब... जब... मेरी लाश तले...। जगपती
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तब.... तब की बात झूठ है। लेकिन जब तुमने मुझे बेच दिया.....।- चंदा
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हरा होने से क्या, उखट तो गया
है। न फूल का न फल का। अब कौन इसमें फल-फूल आएँगे, चार दिनों में पत्ती झुरा जाएगी।– शकूरे
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भगवान के राज में देर है, अंधेर नहीं, जगपती भैया।– मुंशी जी
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अंधेर तो सरासर है, तिरिया चरित्तर
है सब, बड़े-बड़े हार गए हैं।– मुंशी जी
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चंदा दूसरे के घर बैठ रही है, कोई मदसूदन
है वहीं का। पर बच्चा दीवार बन गया है। चाहते तो वो यही हैं कि मर जाए तो रास्ता खुले, पर राम जी की मर्जी। सुना है, बच्चा रहते
भी वह चंदा को बैठाने को तैयार है।– मुंशी जी
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अदालत से बच्चा तुम्हें मिल सकता है। अब काहे का शरम-लिहाज।– मुंशी जी
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औलाद ही तो वह स्नेह की धुरी है, जो आदमी औरत
के पहियों को साधकर तन के दलदल से पार ले जाती है। नहीं तो हर औरत वेश्या हैं और हर
आदमी वासना का कीड़ा।
·
चंदा, मेरी अंतिम चाह यही है कि तुम बच्चे को लेकर
चली आना। ...... चंदा, आदमी को पाप नहीं, पश्चाताप मारता है। मैं बहुत पहले मर चुका था।– जगपती
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किसी ने मुझे मारा नहीं है, किसी आदमी ने
नहीं। .... मैंने अफीम नहीं, रुपये खाए हैं।
उन रुपयों में कर्ज का जहर था, उसी ने मुझे
मारा है।– जगपती
वीडियो के लिए इस लिंक पर जाएँ-
https://youtu.be/PoRfX6dSF40
‘राजा निरबंसिया’ कहानी पर राजेन्द्र
यादव जी का यह लेख ‘नयी कहानी’ की एक कालजयी कथा राजा निरबंसिया’भी आवशय पढ़ें। यह लेख मैंने गूगल से ली लिया है।
नयी कहानी’
आंदोलन से अनेक कहानी-प्रतिभाएं साहित्य क्षेत्र में आयी थीं जिनमें कमलेश्वर, राजेंद्र यादव और मोहन राकेश की त्रयी का विशिष्ट
महत्व है। राजेंद्र यादव ने एक दौर में अच्छी कहानियां देकर अपने को उपन्यास लेखन
में और बाद में पुस्तक व्यवसाय में प्रवृत्त किया, इधर दो-एक
जो छिटपुट कहानियां यादव ने लिखीं वे किसी भी दृष्टि से स्तरीय नहीं हैं, केवल कामानुभवों के बुढ़भस अनुभव मात्र ‘हासिल’ जैसी कहानियों में आए।
मोहन राकेश असमय ही क्रूर काल ने छीन लिये और वैसे भी बाद में उनका ध्यान कहानी से
अधिक नाटक पर चला गया। इस त्रयी में एकमात्र कमलेश्वर ही ऐसे कहानीकार रहे जिनका
कहानीकार अंत तक सृजनशील रहा। प्रत्येक आंदोलन के दौर में और उन सबसे अलग कमलेश्वर
की कहानी जब-जब आयी उसने कहानी के प्रति, हिंदी कहानी के
प्रति एक नया विश्वास जगाया। उनकी ‘राजा निरबंसिया’ कहानी आज भी पाठकों तथा
आलोचकों के लिए उतनी ही आकर्षक बनी हुई है। कमलेश्वर ने स्वयं अपनी कहानियों के
तीन दौर माने हैं। ‘राजा निरबंसिया’ उनकी प्रथम दौर की दूसरी अत्यंत चर्चित कहानी
है। यदि यह कहा जाये कि यही कहानी उन्हें हिंदी कथाकारों की अग्रिम पंक्ति में
प्रतिष्ठित करने में सहायक बनी तो अत्युक्ति नहीं होगी। जादू वह जो सिर चढ़कर
बोले। कमलेश्वर के विरोधियों, कटु आलोचकों ने भी इस कहानी को
सराहा है। 2010 ई. में युवा कथाकार पंकज सुबीर
ने अपने उपन्यास ‘ये वो सहर तो नहीं’ में समानान्तर कथा-शिल्प का प्रयोग करते हुए
कमलेश्वर के प्रति आभार व्यक्त करते हुए ‘राजा निरबंसिया’ का ऋण स्वीकार किया है।
वस्तुत: यह कमलेश्वर की अत्यंत सशक्त कथा है। यह कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर
प्रभावित करती है और ‘नयी कहानी’ की लगभग समस्त प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व भी
करती है। ‘राजा निरबंसिया’ कहानी आर्थिक विवशताओं, निरूपायताओं
द्वारा दांपत्य सम्बंधों की मधुरिमा के कड़वाहट में बदलने, उन
सम्बंधों के तिड़कने और टूटने की बेबसी तथा संतानहीन दंपति की सामाजिक स्थिति और
मानसिक पीड़ा, उस पीड़ा-शमन के निमित्त पुत्र प्राप्ति की
ललक आदि का बहुत मार्मिक चित्रण करती है। इस कथ्य को प्रभावी बनाने में लोककथा के
समानान्तर-शिल्प का बहुत बड़ा हाथ है। लोककथा के माध्यम से वर्तमान के दु:ख-दर्द
को जितनी कुशलता से इस कहानी में उकेरा गया है उतनी सफलता हिंदी की किसी अन्य
कहानी को नहीं मिली है। शिल्प दृष्टि से यह कहानी हिंदी कथा के सम्मुख महती
संभावनाओं के द्वार खोल देती है।
‘नयी कहानी’ ने बारंबार अपने को प्रेमचंद से जोड़ा था। प्रेमचंद भाषा-स्तर पर जो विरासत हिंदी कहानी की अभिव्यक्ति को दे गये थे, ‘राजा निरबंसिया’ उसका पूर्ण उपयोग करती है। लोककथा की सहज, सरल शैली में कहानी का प्रारंभ हमारे लोकजीवन को बहुत निकट से प्रस्तुत करता है। आटे का पुरा चौक, चौकी पर मिट्टी की छह गौरें, दीपक, मंगल-घट, रोली का सथिया (स्वास्तिक) आदि कहानी का यह वातावरण पाठक के मानस को एक आदिम स्तर पर प्रभावित कर कहानी को बच्चों के समान ही सुनने को उत्सुक कर देता है।
संपूर्ण कहानी में वर्तमान समय के राजा या नायक जगपति की व्यथा का अन्तर्व्रण रिसता-सा रहता है। उसकी अभिव्यक्ति थोड़ी देर और दूर तक तो प्रत्यक्षत: होती है, फिर वह लोककथा का माध्यम ग्रहण कर लेती है। जैसे ही कहानी जगपति और चंदा के दर्द से बोझिल-सी होने लगती है, वह फौरन लोककथा की क्रोड़ में चली जाती है। इस प्रकार कहानी वर्तमान और अतीत के दो छोरों में डूबती-उतरती हुई भी वर्तमान की ही कथा कहती है। लोककथा का आखेट को गया राजा नहीं लौटता है, सात दिन से अधिक हो गये और इधर रिश्तेदारी की शादी में गया जगपति नहीं लौट पाता है। वह डाके में घायल हो कस्बे के अस्पताल में जा पड़ता है जहां रोती, कलपती चंदा उसे पाती है। इलाज के सिलसिले में वह बचन सिंह कंपाउडर के संपर्क में आती है और फिर चन्दा की आर्थिक मजबूरी धीरे-धीरे इस संपर्क को स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संपर्क में बदल देती है। बचन सिंह के कर्ज के रुपयों का ज़हर धीरे-धीरे चंदा और जगपती के दाम्पत्य-सुख को लील लेता है। वह कर्ज का ज़हर क्रमश: उनकी जिंदगी में फैल जाता है और इस फैलते ज़हर के बीच जगपती को जिस अंतद्र्वंद्व से गुजरना पड़ता है, वह कहानी में बहुत स्वाभाविक रूप से चित्रित हुआ है।
विवेच्य कहानी में जगपति का अंत: संघर्ष भी अत्यंत कुशलता से व्यंजित हुआ है। पहले तो वह इस पीड़ा से दंशित रहता है कि वह नि:संतान, निरबंसिया, है। घर लौटने पर भी अपनी ही चाची का यह ताना सुनाना, ‘राजा निरबंसिया अस्पताल से लौट आए’, उसे भीतर तक छील जाता है। और जब चंदा के गर्भवती होने की खबर जंगल की आग की तरह फैलती है तो एक तो वह दुनिया की नजरों में गिर जाता है और दूसरे अपनी ही नजर जो उसने चंदा के निष्फल मातृत्व को लक्षित कर कहे थे। वस्तुत: वह पुरुष संवेदना का पात्र है जो समाज के सारे लांछन सुनता हुआ आर्थिक बेबसी के कारण अपनी पत्नी को दूसरे की अंकशायिनी होते हुए देखता है। टाल के लिए लकड़ी काटने जाने पर वह शकूरे को छोटे-से हरे पेड़ को काटने के लिए मना करता है किंतु शकूरे का यह कहना ‘हरा होने से क्या, उखट तो गया है। न फूल का, न फल का। अब कौन इसमें फल-फूल आएंगे, चार दिन में पत्ती झुरा जाएंगी।’ उसे अपने जीवन के समानान्तर लगता है। पग-पग पर वेदना के इस असह्य भार को ढोता हुआ जगपति जब चंदा के पुत्र होने और दूसरे मर्द के साथ बैठने की बात सुनता है तो वह आत्मान्वेषण के क्षणों में अपने को ही दोषी पाता है, ‘औलाद ही तो वह स्नेह की धुरी है जो आदमी-औरत के पहियों को साधकर तन के दलदल से पार ले जाती है, नहीं तो हर औरत वेश्या है और हर आदमी वासना का कीड़ा। तो क्या चंदा औरत नहीं रही वह जरूर औरत थी, पर स्वयं मैंने उसे नरक में डाल दिया!’ इस प्रकार जगपति तो निर्मल हृदय है ही, वह चंदा को भी पूर्ण निर्दोष पाता है। इसीलिए वह आत्महत्या से पहले जो ‘दो परचे’ छोड़ता है उसमें चंदा को तो माफ करता ही है, चंदा के उस पुत्र को भी अपने पुत्र के रूप में अपना लेता है। इसीलिए वह यह ‘वसीयत’ करता है कि उसकी लाश तब तक न जलायी जाए जब तक चंदा बच्चे को लेकर न आ जाये और ‘आग बच्चे से दिलवाई जाए।’ इस प्रेम-कथा की अद्भुत परिणति है यह। इस रूप में जगपति भी हमारे लिए एक बहुत आदर्श पात्र बन जाता है। उसकी यह आत्म-स्वीकृति तो अपनी जगह सही है कि ‘मैंने अफीम नहीं, रुपये खाए हैं।’ किंतु कथा का यह आदर्शवादी और भावुकतापूर्ण अंत है। इसीलिए कहानी का एकमात्र कमजोर स्थल भी यही है। अपनी पत्नी की जारज संतान का स्वीकार और उसे मन से क्षमा प्रदान करना कहानी को आदर्श का, भावुक रोमान का एक रंग दे जाती है जिसकी कहानी के यथार्थ से संगति नहीं बैठती और जो कहानी की समग्र प्रभावान्विति को ठेस पहुंचाता है। किंतु कहानी का यह अभाव भी न तो जगपति के प्रति पाठक की सहानुभूति को समाप्त करता है और न कहानी का आकर्षण खोता है।
‘राजा निरबंसिया’ के समानान्तर कथा-शिल्प की बात ऊपर कथ्य के साथ ही की जा चुकी है किंतु यदि कहानी की भाषा-संरचना और अभिव्यक्ति-कौशल पर ध्यान दिया जाये तो उसकी भाषा में एक सहज टटकापन है जो अपनी सहजता में बांधता है। नयी कहानी के कुछ कहानीकारों की भाषा को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने प्रेमचंद के भाषा-संस्कार को ग्रहणकर बोलचाल की भाषा को तराशा और उसे एक अभिन्न साहित्यिक अभिजात्य प्रदान किया। कमलेश्वर और उनकी ‘राजा निरबंसिया’ का भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है कि उसमें बोलचाल की भाषा से साहित्यिक भाषा को अपूर्ण कथ्य-क्षमता प्रदान की गयी है। कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर ‘राजा निरबंसिया’ हिंदी कहानी की अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि है।’
‘नयी कहानी’ ने बारंबार अपने को प्रेमचंद से जोड़ा था। प्रेमचंद भाषा-स्तर पर जो विरासत हिंदी कहानी की अभिव्यक्ति को दे गये थे, ‘राजा निरबंसिया’ उसका पूर्ण उपयोग करती है। लोककथा की सहज, सरल शैली में कहानी का प्रारंभ हमारे लोकजीवन को बहुत निकट से प्रस्तुत करता है। आटे का पुरा चौक, चौकी पर मिट्टी की छह गौरें, दीपक, मंगल-घट, रोली का सथिया (स्वास्तिक) आदि कहानी का यह वातावरण पाठक के मानस को एक आदिम स्तर पर प्रभावित कर कहानी को बच्चों के समान ही सुनने को उत्सुक कर देता है।
संपूर्ण कहानी में वर्तमान समय के राजा या नायक जगपति की व्यथा का अन्तर्व्रण रिसता-सा रहता है। उसकी अभिव्यक्ति थोड़ी देर और दूर तक तो प्रत्यक्षत: होती है, फिर वह लोककथा का माध्यम ग्रहण कर लेती है। जैसे ही कहानी जगपति और चंदा के दर्द से बोझिल-सी होने लगती है, वह फौरन लोककथा की क्रोड़ में चली जाती है। इस प्रकार कहानी वर्तमान और अतीत के दो छोरों में डूबती-उतरती हुई भी वर्तमान की ही कथा कहती है। लोककथा का आखेट को गया राजा नहीं लौटता है, सात दिन से अधिक हो गये और इधर रिश्तेदारी की शादी में गया जगपति नहीं लौट पाता है। वह डाके में घायल हो कस्बे के अस्पताल में जा पड़ता है जहां रोती, कलपती चंदा उसे पाती है। इलाज के सिलसिले में वह बचन सिंह कंपाउडर के संपर्क में आती है और फिर चन्दा की आर्थिक मजबूरी धीरे-धीरे इस संपर्क को स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संपर्क में बदल देती है। बचन सिंह के कर्ज के रुपयों का ज़हर धीरे-धीरे चंदा और जगपती के दाम्पत्य-सुख को लील लेता है। वह कर्ज का ज़हर क्रमश: उनकी जिंदगी में फैल जाता है और इस फैलते ज़हर के बीच जगपती को जिस अंतद्र्वंद्व से गुजरना पड़ता है, वह कहानी में बहुत स्वाभाविक रूप से चित्रित हुआ है।
विवेच्य कहानी में जगपति का अंत: संघर्ष भी अत्यंत कुशलता से व्यंजित हुआ है। पहले तो वह इस पीड़ा से दंशित रहता है कि वह नि:संतान, निरबंसिया, है। घर लौटने पर भी अपनी ही चाची का यह ताना सुनाना, ‘राजा निरबंसिया अस्पताल से लौट आए’, उसे भीतर तक छील जाता है। और जब चंदा के गर्भवती होने की खबर जंगल की आग की तरह फैलती है तो एक तो वह दुनिया की नजरों में गिर जाता है और दूसरे अपनी ही नजर जो उसने चंदा के निष्फल मातृत्व को लक्षित कर कहे थे। वस्तुत: वह पुरुष संवेदना का पात्र है जो समाज के सारे लांछन सुनता हुआ आर्थिक बेबसी के कारण अपनी पत्नी को दूसरे की अंकशायिनी होते हुए देखता है। टाल के लिए लकड़ी काटने जाने पर वह शकूरे को छोटे-से हरे पेड़ को काटने के लिए मना करता है किंतु शकूरे का यह कहना ‘हरा होने से क्या, उखट तो गया है। न फूल का, न फल का। अब कौन इसमें फल-फूल आएंगे, चार दिन में पत्ती झुरा जाएंगी।’ उसे अपने जीवन के समानान्तर लगता है। पग-पग पर वेदना के इस असह्य भार को ढोता हुआ जगपति जब चंदा के पुत्र होने और दूसरे मर्द के साथ बैठने की बात सुनता है तो वह आत्मान्वेषण के क्षणों में अपने को ही दोषी पाता है, ‘औलाद ही तो वह स्नेह की धुरी है जो आदमी-औरत के पहियों को साधकर तन के दलदल से पार ले जाती है, नहीं तो हर औरत वेश्या है और हर आदमी वासना का कीड़ा। तो क्या चंदा औरत नहीं रही वह जरूर औरत थी, पर स्वयं मैंने उसे नरक में डाल दिया!’ इस प्रकार जगपति तो निर्मल हृदय है ही, वह चंदा को भी पूर्ण निर्दोष पाता है। इसीलिए वह आत्महत्या से पहले जो ‘दो परचे’ छोड़ता है उसमें चंदा को तो माफ करता ही है, चंदा के उस पुत्र को भी अपने पुत्र के रूप में अपना लेता है। इसीलिए वह यह ‘वसीयत’ करता है कि उसकी लाश तब तक न जलायी जाए जब तक चंदा बच्चे को लेकर न आ जाये और ‘आग बच्चे से दिलवाई जाए।’ इस प्रेम-कथा की अद्भुत परिणति है यह। इस रूप में जगपति भी हमारे लिए एक बहुत आदर्श पात्र बन जाता है। उसकी यह आत्म-स्वीकृति तो अपनी जगह सही है कि ‘मैंने अफीम नहीं, रुपये खाए हैं।’ किंतु कथा का यह आदर्शवादी और भावुकतापूर्ण अंत है। इसीलिए कहानी का एकमात्र कमजोर स्थल भी यही है। अपनी पत्नी की जारज संतान का स्वीकार और उसे मन से क्षमा प्रदान करना कहानी को आदर्श का, भावुक रोमान का एक रंग दे जाती है जिसकी कहानी के यथार्थ से संगति नहीं बैठती और जो कहानी की समग्र प्रभावान्विति को ठेस पहुंचाता है। किंतु कहानी का यह अभाव भी न तो जगपति के प्रति पाठक की सहानुभूति को समाप्त करता है और न कहानी का आकर्षण खोता है।
‘राजा निरबंसिया’ के समानान्तर कथा-शिल्प की बात ऊपर कथ्य के साथ ही की जा चुकी है किंतु यदि कहानी की भाषा-संरचना और अभिव्यक्ति-कौशल पर ध्यान दिया जाये तो उसकी भाषा में एक सहज टटकापन है जो अपनी सहजता में बांधता है। नयी कहानी के कुछ कहानीकारों की भाषा को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने प्रेमचंद के भाषा-संस्कार को ग्रहणकर बोलचाल की भाषा को तराशा और उसे एक अभिन्न साहित्यिक अभिजात्य प्रदान किया। कमलेश्वर और उनकी ‘राजा निरबंसिया’ का भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है कि उसमें बोलचाल की भाषा से साहित्यिक भाषा को अपूर्ण कथ्य-क्षमता प्रदान की गयी है। कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर ‘राजा निरबंसिया’ हिंदी कहानी की अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि है।’
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