प्रेमचंद से संदर्भित कुछ महत्त्वपूर्ण कथन।

NTA/UGC NET/JRF के लिए उपयोगी।

1. प्रेमचंद: 'साहित्‍य की सृष्टि मानव समुदाय को आगे बढ़ाने के वास्‍ते होती है, साहित्‍यकार स्‍वयं भी स्‍वभावत: प्रगतिशील होता है।'
 
2. प्रेमचंद: ‘हम तारीख से यह सबक न लें कि हम क्‍या थे, यह देखें कि क्‍या हो सकते थे, भूत हमारे भविष्‍य का रहबर नहीं बन सकता।’ 

3. प्रेमचंद: ‘प्राचीन कथा शिक्षाप्रद, धार्मिक, मनोरंजन व कौतूहल दर्शाती थी, पर सीमित मात्रा में इसके विपरीत आज की कहानी पात्रों के मनोविश्‍लेषणात्‍मक चित्रण द्वारा ही सार्थकता पाती है।’ 

4. रामदास गौड़: ‘भविष्‍य में भारतीय साहित्‍य के इतिहास के नये रचनाकार जब भी सृजन करेंगे, उन्‍हें जीवन के यथार्थ चित्रण में प्रेमचंद की दक्षता स्‍वीकार करनी ही पड़ेगी।’

5. प्रेमचंद: ‘कहानी में जो सामग्री उत्‍पन्‍न हो वह नग्‍न यथार्थ न होकर यथार्थ जैसी लगनी चाहिए क्‍योंकि उसका पटल अत्‍यंत संक्षिप्‍त होता है जबकि नग्‍न यथार्थ वितृष्‍णा उपजाता है। पात्र अपने जीवन में कभी सुख कभी दु:ख की अनुभूति करता है तो इसका प्रस्‍तुतिकरण लेखक कलात्‍मक व औचित्‍यपूर्ण ढंग से करे जिससे पाठक भी सहमत हों। साहित्यि‍क न्‍याय इसे ही कहते हैं।’

6. प्रेमचंद: ‘कहानी संक्षिप्‍त हो, पर रोचक हो, वर्णनों में गति हो, सर्वांगपूर्ण हो। एक ही बैठक में सुने जाने योग्‍य हो। पाठकों का मनोरंजन करने के साथ-साथ समाज-निर्माण में भी सहायक हो। उसमें ऐसी सामग्री विद्यमान हो जो पथ-प्रदर्शन करने के साथ-साथ मन में सुंदर भाव व आत्‍म संतुष्टि जगा सके।'

7. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी: 'प्रेमचंद के कथा साहित्‍य अध्‍ययन से उत्तर भारत की समस्‍त जनता के आचार-विचार, भाषा-भाव, आशा-आकांक्षा, दु:ख-दर्द, रीति-रिवाज़ों को जान सकते हैं। झोपडियों से महलों तक, खोमचे वालों से बैंकों तक, गांव से शहर की रंगीनियों तक, अमीरों से कृषकों तक आपको इतने कौशलपूर्वक व प्रामाणिक भाव से अन्‍य कोई नहीं ले जा सकता। इतनी विविधता अन्‍यत्र नहीं मिलेगी।’

8. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: ‘आज भी प्रेमचंद जहां हमें छोड़कर कर गये थे, वहां से आगे हम बढ़ नहीं पाये।’

9. प्रेमचंद: ‘मानवीय चरित्र इतना जटिल है कि बुरे से बुरा आदमी भी देवता हो जाता है और अच्‍छे से अच्‍छा आदमी पशु। पर वास्‍तव में मानव स्थितियों के हाथ का खिलौना मात्र है अर्थात मानव चित्रण की यह जटिलता स्थितियों की जटिलता का प्रतिबिम्‍ब है’। 

10. प्रेमचंद: ‘जो लेखक मानव हृदयों के रहस्‍यों को खोलने में सक्षम है, उसी की रचना सफल है वह उन्‍हीं पात्रों का सफल चित्रण कर सकता है जिनसे वह निजी अनुभव से परिचित है। मेरे अधि‍कांश पात्र यथार्थ जीवन से लिए गये। जब किसी पात्र का यथार्थ में अस्तित्‍व नहीं होता, तब वह छाया मात्र अनिश्‍चित अविश्‍वसनीय हो उठता है।’

11. डॉ. इन्‍द्रनाथ मदान: ‘‘कहानियों के पात्र बहुमुखी व विविध हैं इसका कारण प्रेमचंद के निजी अनुभव, विस्‍तृत ज्ञान, दार्शनिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक व्‍यवस्‍था के प्रति रूख और इनसे भी बढ़कर सर्वप्रमुख बात-आसपास की बिखरी जिंदगी में विचर रहे मनुष्‍यों को भीतर से जानने का प्रयास। लेखक का व्‍यक्तित्‍व भी वही विकास पाता है जब वो निम्‍न मध्‍यवर्ग, श्रमिकों, दलितों व कृषकों के जीवन संघर्ष को लेखनी में साकार करने को आतुर हो उठते हैं। प्रसंगानुसार तीखे-चटपटे हास्‍य व्‍यंग्‍य के अचूक प्रहार सामाजिक विषमता पर भी किये।’’

12. प्रेमचंद: ‘स्‍वर्ग और नरक के ख्‍याल में वे लोग रहते हैं जो आलसी हैं, मुर्दा हैं, हमारा स्‍वर्ग नरक यहीं ठोस धरती पर है, इस कर्म विधान विश्‍व में हम कुछ करना चाहते हैं।’

13. प्रेमचंद: ‘‘कहानियां केवल घटनाओं व सूचनाओं का संग्रहालय नहीं, अपितु जीवन और उसके पात्रों के अन्‍तर्विरोधियों की सार्थक अभिव्‍यक्ति है। आज की कहानी मनोवैज्ञानिक विश्‍लेषण व यथार्थ चित्रण को अपना ध्‍येय मानती है। कई रस्‍मों, कई चरित्रों, कई घटनाओं के लिए कथा की जमीन के पास स्‍थान नहीं। आज के लेखक का उद्देश्‍य स्‍थूल सौंदर्य नहीं, एक ऐसी प्रेरणा है, जिसमें सौंदर्य की झलक हो, इसके द्वारा पाठक की कोमल भावनाओं को स्‍पर्श कर सके’’

14. 'महाजनी सभ्‍यता’ में प्रेमचंद: 'जिनके पास पैसा है, वह देवता तुल्‍य है उसका अंत:करण कितना भी काला क्‍यूं न हो साहित्‍य, संगीत, कला सभी धन की देहली पर माथा टेकते हैं हवा इतनी जहरीली हो गई है कि सांस लेना दूभर हो रहा है’।

15. म'महाजनी सभ्यता' में प्रेमचंद: ‘जिसमें मनुष्‍यता, उच्‍चता, अध्‍यात्‍म सौंदर्य बोध है वह कभी भी ऐसी दूषित व्‍यवस्‍था का समर्थन नहीं करेगा, जिसकी नींव लोभ, स्‍वार्थ-परकता व दुष्‍ट मनोवृति पर टिकी हो’। 
16. प्रेमचंद: ‘भारत की आत्‍मा अभी जीवित है मुझे विश्‍वास है कि वह समय आने में देर नहीं जब हम सेवा, त्‍याग, अविश्‍वास के पुराने आदर्शो पर लौट आयेंगे, तब धन हमारा ध्‍येय नहीं होगा। हमारा मूल्‍य धन के कांटे पर नहीं तोला जाएगा। प्रत्‍येक व्‍यक्ति जो अपने शारीरिक श्रम व दिमाग की मेहनत से कुछ पैदा कर सकता है वही राष्‍ट्र व समाज का सम्‍मानि‍त सदस्‍य बन सकता है।’

17. प्रेमचंद: 'सामाजिक और आर्थिक आवरण के नीचे आ‍खिर पूंजीवादी भी मनुष्‍य हैं। उसी तरह दु:ख दर्द के शिकार हैं जैसे मजदूर। राजनैतिक दलबंदी में आकर अपने मन में ऐसे खाने बना लेना कि उनके दु:ख दर्द का प्रवेश ही न हो, सर्वथा अप्राकृतिक और अमानवीय है’। 

18. प्रेमचंद: 'साहित्‍य में प्रभाव उत्‍पन्‍न करने के लिए आवश्‍यक है कि वह जीवन की सच्‍चाइयों का दर्पण हो।

19. प्रेमचंद: 'मनुष्‍य को वही कला मोहित करती है जि‍स पर मनुष्‍य की आत्‍मा की छाप हो, जो गीली मिट्टी की भांति मानव हृदय के सांचे में पड़कर परिष्‍कृत हो जाए।

20. प्रेमचंद: 'जो कुछ स्‍वाभाविक है, वही सत्‍य है, स्‍वाभाविकता से दूर कला अपना आनंद खो देती है, जिसे समझने वाले थोड़े से कलाविद् ही रह जाते हैं, उनमें जनता के मर्म को स्‍पर्श करने की शक्ति नहीं रह जाती।’

21. प्रेमचंद: ‘मुझे यह कहने में हिचक नहीं कि मैं और चीजों की तरह कला को भी उपयोगिता की तुला पर तोलता हूं निस्‍संदेह कला का उद्देश्‍य सौहार्द पुष्टि करना है। वह हमारे आध्‍यात्मिक आनंद की कुंजी है’ 

22. प्रेमचंद: 'साहित्‍यकार पैदा होता है, बनाया नही जाता। उसका लक्ष्‍य केवल महफिल सजाना व मनोरंजन के साधन जुटाना नहीं, वह देश भक्‍ति राजनीति के पीछे चलने वाली सच्‍चाई भी नहीं अपितु उनके आगे मशाल दिखाती सच्‍चाई है। प्रभुत्‍व, अन्‍याय, आत्‍म-सर्वस्‍वता के विरूद्ध मानव के मन में जो विद्रोह जल उठता है वही साहित्‍य है

23. प्रेमचंद: 'हमारी कसौटी पर वही साहित्‍य खरा उतरेगा जिसमें उच्‍च चिंतन हो, स्‍वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की प्रेरणा हो जो हममें गति व संघर्ष, बैचेनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्‍योंकि सोना मृत्‍यु का लक्षण है।’

24. प्रेमचंद: ‘भावोत्तेजक कला का मौसम अ‍ब नहीं रहा।'

25. प्रेमचंद: ‘सूखी रोटियां सोने के थालों में परोस देने से पूरियां नहीं बन जाती’

26. प्रेमचंद: ‘मनुष्‍य के लिए कुछ भी असंभव नहीं यदि मानव पतन के गर्त में गिर सकता है तो आकाश गंगा में भी नहा सकता है’। 

27. प्रेमचंद: ‘साहित्‍य की सृष्टि मानव समुदाय को आगे बढ़ाने के वास्‍ते होती है, साहित्‍यकार स्‍वयं भी स्‍वभावत: प्रगतिशील होता है... आदर्श अवश्‍य हो, पर यथार्थवाद व स्‍वाभाविकता के अनुकूल हो, वैसे ही अगर यथार्थवादी भी आदर्श को न भूले तो श्रेष्‍ठ है।’

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