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बाढ़ और बरगद का पेड़: दो किस्से

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घटना नम्बर-1 वर्ष 1997-98 की बात रही होगी। ममहर छोड़ना पड़ा था। नानी हम दो भाइयों को (बड़े भैया के साथ मैं भी था) लेकर मेरे गाँव बथनाहा (सीतामढ़ी)) आ रही थीं। बिहारी (मधुबनी) से लेकर भिट्ठामोर तक करीब 10-15 जगह पर 100-100 मीटर बाढ़ की पानी की धार को हेलना पड़ा था। नानी सिर पर पोटली रखे आगे-आगे चलती थीं। मैं उनकी कमर में हाथ डालकर साया-साड़ी को जोड़ से पकड़कर बीच में चलता था। बड़े भैया सबसे पीछे मुझे कसकर पकड़कर चल रहे थे। इस तरह हमने बाढ़ की धार को काटा। लेकिन जब भिट्ठामोर गाँव के पास पहुंचा तो हिम्मत जवाब देने लगी। करीब 700-800 मीटर तक धार को हेलना था। कहीं घुटने भर पानी था तो कहीं कमर भर। इस धार में एक जगह मेरे दोनों पैर जमीन से उखड़ गए थे। नानी की कमर और बड़े भाई का हाथ पकड़े मैं पानी में तैरने लगा था। दोनों ने मुझे जैसे-तैसे संभाला। घटना नम्बर-2 बात 2001 की है। उस साल 1987 से भी बड़ी बाढ़ आई थी। 87 की बाढ़ बिहार में सबसे बड़ी बाढ़ मानी जा रही थी। उसका रेकॉर्ड टूट चुका था। मैं पटना से दरभंगा के रास्ते सीतामढ़ी ट्रेन से लौट रहा था। दरभंगा से पुपरी आकर ट्रेन रुक गई। उसके आगे का रास्ता बंद था। ...